निमाटोड एक बहुत बारीक धागे जैसा कीड़ा होता है जो मिट्टी में रहता है। निमाटोड कई तरह के होते हैं और इनकी हर तरह की किस्म फसल को नुकसान पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। यह कई वर्षों तक मिट्टी में दबे रह सकते हैं और पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। यह पौधे की जड़ों का रस चूसते हैं, जिस कारण पौधों को मिट्टी में से खाद, पानी या पोषक तत्व भरपूर मात्रा में नहीं मिलते और पौधों की ग्रोथ रूक जाती है।
निमाटोड के हमले से पौधों की जड़ों में गांठे बन जाती हैं, जिससे पौधे का विकास रूक जाता है और पौधा मर जाता है। यह लगभग हर फसल पर हमला कर देते हैं और इनसे कई तरह की बीमारियां भी फैलती हैं जैसे जड़ों में गांठे पड़ना, नींबू में सूखा रोग, जड़ गलना, जड़ का फूलना आदि प्रमुख हैं।
नत्थाटॉप सबसे बढ़ा, विश्नाह फार्म तीसरे नंबर पर
जम्मू संभाग का सबसे बड़ा आलू फार्म नत्थाटॉप में है। इसका 70 एकड़ में फैला हुआ है। दूसरे नंबर पर गूल फार्म (52 एकड़) और तीसरे स्थान पर कोटली मियां फतेह, विश्नाह (19 एकड़) है। इसके अलावा राजोरी में एक फार्म है, जो अब ईको टूरिज्म के पास है।
1961 से है निमाटोड का असर
निमाटोड बीमारी 1961 से आलू की फसल को प्रभावित कर रही है। नत्थाटॉप में इस बीमारी के बारे में कुछ वर्ष पहले ही पता चला है।
जम्मू संभाग में नत्थाटॉप आलू फॉर्म सबसे बड़ा है। यहां पर आलू की फसल पर निमाटोड बीमारी का ज्यादा असर है। इसके बारे में अध्ययन किया जा रहा है। - अक्षय चौधरी, डेवलेपमेंट अधिकारी।
निमाटोड बीमारी को लेकर उपाय ढूंढे जा रहे हैं। उम्मीद है कि जल्द बीमारी से छुटकारा मिल जाएगा। इसके साथ ही किसानों को जागरूक भी किया जा रहा है। - अरशद नायक, मैनेजर, आलू फार्म नत्थाटॉप।