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कुंड के पानी का रंग बदलना बड़ा अपशकुन तो नहीं?

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माता खीर भवानी के कुंड के पानी ने फिर रंग बदल लिया है। इस बार पानी का रंग हल्का लाल है। कश्मीरी पंडित कुंड में पानी के इस रंग को भी अपशकुन मानते हैं। कुंड के पानी के रंग में हुए इस बदलाव से बेखबर सियासी पताके अपने रंगों का जोर चलाने का दंभ भर रहे हैं।
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बिहामा से दुदरहामा चौक की चहलपहल बांडीपोरा के गुलशन चौक से अलग नहीं है। सड़कों के ऊपर दोनों किनारे लाल, हरे और भगवा रंग के पताके लहरा रहे हैं। छोटे पोस्टरों की झालरें लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव की पूरी हो चुकी तैयारियों के गवाह हैं। शोर थमा है और वोटरों की खामोशी ने सियासतदानों के दिलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं।

सड़क के किनारे पेड़ों और खंभों से पतली रस्सियों के सहारे झूलते बैनरों में पीढ़ियों के सफर की कहानी है और नई बुनियाद बनाने की तैयारियां भी साफ दिखती है। अपनों की बगावत है तो पीठ में छुरा घोंपने की अनकही दास्तान सियासी शोर में उलझी है। बैनरों पर छपी तस्वीरें चुनावी कथा बांच रही हैं।
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नेशनल कांफ्रेंस के बैनरों में शेख अब्दुल्ला सबसे ऊपर है और नीचे फारूकऔर उमर की तस्वीरें। किसी बैनर में अकेले शेख अब्दुल्ला ही नजर आते हैं। पीडीपी के बैनरों में मुफ्ती और महबूबा के अलावा स्थानीय प्रत्याशी भी नजर आते हैं। नेकां के बागी उम्मीदवारों ने भी ताल ठोंक रखी है।
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पीढ़ियों की विरासत बचाने की कवायद

सिर्फ गांदरबाल में ही नहीं इस बार कई क्षेत्रों में नेकां कई मोर्चों पर जंग लड़ रही है। कभी नेकां के जिला अध्यक्ष रहे गुलाम अहमद सलूरा ने अवामी इंसाफ पार्टी बना ली है और चुनाव मैदान में डटे हैं। कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे मोहम्मद युसूफ भट भी नेकां से ही निकले हैं। नेकां ने पूर्व मंत्री स्वर्गीय शेख जब्बार के पुत्र शेख इशाक जब्बार पर दांव लगाया है।

पीडीपी के काजी मोहम्मद अफजल भी ताल ठोंक रहे हैं। अब्दुल्ला परिवार की पुश्तैनी सीट इस बार अलग तरीके के सियासी जंग की गवाह बन रही है। इस सीट ने पहले शेख अब्दुल्ला, फिर फारूक और बाद में उमर को विधानसभा भेजा है।

इस बार उमर ने सीट छोड़ी तो उन्हें पीडीपी ने भगोड़ा तक कहा। अब सियासी जंग रोचक मोड़ पर है। बिहामा चौक के फिरदौस की मानें तो सब कुछ मतदान के प्रतिशत पर निर्भर करेगा। कम मतदान की स्थिति में नतीजे चौंकाने वाले होते हैं।
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