विस्थापन का दर्द झेल रहे कश्मीरी पंडितों ने सरकार की बेरुखी पर लोकसभा उपचुनाव में पलटवार किया है। घाटी में ससम्मान वापसी तथा पंडितों की कालोनी बसाए जाने के तमाम वादों के बाद भी खाली हाथ रहे विस्थापितों ने मतदान के लिए फार्म भरने में दिलचस्पी नहीं दिखाई।
श्रीनगर सीट के लिए 35 हजार से अधिक विस्थापितों में से मात्र 2388 ने फार्म भरा यानी लगभग छह फीसदी विस्थापित लोकतंत्र के पर्व में शामिल होने को तैयार हुए। इनमें से भी मात्र 971 ने जम्मू, उधमपुर और दिल्ली में बने केंद्रों पर वोट डाले।
कश्मीरी पंडितों का कहना है कि घाटी में आतंकवाद का दौर शुरू होने के बाद विस्थापन को लगभग 27 साल हो गए। हर सरकार ने उनसे ढेर सारे वायदे किए, लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं हुआ।
सरकारों की घोषणाएं बयानबाजी तक सीमित
महबूबा मुफ्ती और नरेंद्र मोदी
- फोटो : फाइल फोटो
मौजूदा केंद्र की भाजपा सरकार और रियासत की पीडीपी-भाजपा गठबंधन की सरकार ने भी उनकी घाटी में वापसी के बड़े बड़े वायदे किए। कालोनी बसाने की बात कही। बेरोजगारों को नौकरी देने के लिए विशेष अभियान चलाने का वादा किया। हकीकत यह है कि यह सब बयानबाजी भर रह गया है।
कश्मीरी पंडितों के हक की जब भी घोषणा होती है तो घाटी में अलगाववादियों का विरोध प्रदर्शन शुरू हो जाता है। इसके बाद मामला दफन कर दिया जाता है। मौजूदा सरकार ने भी यही किया है।
कश्मीरी पंडित नेता सुनील पंडिता का कहना है कि आखिर कश्मीरी पंडित वोट क्यों डाले। हर बार उसके साथ छलावा किया जाता है। गंदी राजनीति का खामियाजा कश्मीरी पंडित भुगत रहे हैं। उनका कहना है कि एम फार्म भरने में भी पीक एंड चूज की नीति अपनाई गई है। कई पंडितों के फार्म अस्वीकार कर दिए गए।
नोटा को भी बनाया हथियार
नोटा को बनाया हथियार
- फोटो : डेमो फोटो
कश्मीरी पंडितों ने नोटा को भी विरोध दर्ज कराने का हथियार बनाया। जम्मू के जगती टाउन में नोटा के पोस्टर लगाए गए। पंडितों का कहना है मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में उनका किसी भी दल में विश्वास नहीं है। इस वजह से उन्होंने नोटा का विकल्प अपनाने का आह्वान किया था।