कश्मीर को फिर नजर लग गई। एक और टूरिस्ट सीजन तबाह हो गया। न डल के शिकारे गुलजार हैं न निशात बाग और चश्मे शाही में रौनक है। पहलगाम की बेताब वैली में भी सन्नाटा है। अमरनाथ यात्रा शुरू होने को है, लेकिन बाबा के भक्त पसोपेश में हैं। कश्मीरियों के लिए कमाई के ये सबसे सुनहरे दिन होते हैं, पर दहशत के सौदाइयों ने अबके बरस भी ईद फीकी कर दी।
आग, गोलियां और लाशें कश्मीरियत पर भारी पड़ रहीं हैं। हालात 90 के दशक से भी ज्यादा खतरनाक हैं। इसकी दो वजह हैं। एक तो बुरहान बानी के खात्मे के समय सरकार ने बवाल का अंदेशा होते हुए भी कतई एहतियात नहीं बरता। अलगाववादियों ने भीड़ को उन्मादी बनाया और प्रशासन ने चुपचाप यह होने दिया।
जब बुरहान के जनाज़े में मुफ्ती मोहम्मद सईद के जनाजे से ज्यादा लोग शामिल हुए, हथियारबंद आतंकी उसे सलामी देने का दुस्साहस कर भी मह़फूज बने रहे तो सरकार की इच्छा शक्ति पर सवालिया निशान लगा।
नोटबंदी और हवाला पर चोट से टूटने लगा अलगाववाद का तिलिस्म
कश्मीर के अलगाववादी नेता
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दूसरी वजह, दो महीने के सीरियल उपद्रवों के बाद जब जनता ने देखा कि उसका इस्तेमाल उसी की तबाही में किया जा रहा है तो आतंकियों और अलगाववादियों से उसका मोहभंग होना शुरू हो गया। इसी बीच सेना ने टॉप आतंकी कमांडरों को चुन-चुनकर मारने की मुहिम छेड़ दी।
अब तक जो जनता इन्हें पनाह दे रही थी, उसी में से बहुत से लोग अब इनकी सूचनाएं सुरक्षा बलों तक पहुंचाने लगे। आतंकियों की मुसीबतें यहीं नहीं थमीं। पहले नोटबंदी, फिर अलगाववादियों के हवाला कारोबार पर करारी चोट से धन की आमद भी रुक गई।
वेतनभोगी आतंकियों का भुगतान अटक गया। रकम के इंतजाम के लिए बैंक और एटीएम लूटे जाने लगे। सुरक्षा बलों की मदद करने वाले पुलिसकर्मियों की हत्याएं होने लगीं। सेना छोड़ने का फरमान ठुकराने पर उमर फैयाज की जान ले ली गई। आतंकी वारदातों की बाढ़ आ गई।
कितनी भी पाक परस्ती हो सेना हर पल थामती है कश्मीरियों का हाथ
Army with Kashmir
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आतंकी हमले बढ़े उससे कहीं ज्यादा आतंकियों के मारे जाने की खबरें आने लगीं। इसी के सामानांतर सेना एक बड़ा काम कश्मीरी युवाओं को उनके बेहतर मुस्तकबिल के लिए प्लेटफार्म मुहैया कराने का कर रही है। लोगों ने देखा कि जिस सेना पर संगसाजी के लिए उनके बच्चों को पाकिस्तान से पैसे मिल रहे हैं वही सेना संकट की हर घड़ी में उनका हाथ थामती हैं।
उनके बच्चों को कश्मीर से बाहर की दुनिया से रूबरू कराती है। बच्चों को खेल, पढ़ाई और हर क्षेत्र में हुनर दिखाने का मौका मुहैया कराती है। ऐसे में सेना पर भरोसा और मुख्यधारा में बहने की ललक बढ़ना स्वाभाविक था। यही हुआ। सेना जहां युवाओं का मिज़ाज बदल रही थी वहीं घाटी में उसका सूचना तंत्र भी बहुत मजबूत हो गया।
इसका नतीजा यह हुआ लश्कर, हिज्ब और जैश के कमांडर किसी एक ही ठिकाने पर ज्यादा दिन नहीं टिक पाते। एक तरफ पैसे की किल्लत दूसरी तरफ बार-बार ठिकाना बदलने की मजबूरी उन्हें पस्त करने लगी। सेना की रणनीति भी यही है, ढूंढ़ो, भगाओ, थकाओ और खत्म करो। अब उसके मददगार भी बहुतेरे हैं। पुराने आतंकियों के लगातार मारे जाने और नई भर्तियां न हो पाने से आतंकी संगठनों की कमर टूटने लगी है।
कई दिनों के कर्फ्यू के बीच पैसे कमाने का सबसे आसान जरिया पत्थरबाजी
कश्मीर में हिंसक प्रदर्शन
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लेकिन, हालात एकाएक तो नहीं बिगड़े। इसकी बड़ी वजह यह रही कि सरकारें भरोसा नहीं जगा पाई। बेकारी और बेरोजगारी ने पत्थरबाजी को भी रोजगार बना दिया। कई-कई दिनों तक रहने वाले कर्फ्यू और बंद के बीच पैसा कमाने का सबसे सरल जरिया पत्थर फेंकना बन जाए, यह कश्मीर में ही मुमकिन है। कश्मीर के लिए सैलानी फरिश्तों से कम नहीं होते।
उनकी आमद का कम होना खुदा की रहमतों के कम होने जैसा होता है। बाढ़ से बर्बाद हो चुके कश्मीर के लिए बुरहान की मौत से उठा बवाल तबाही के एक और तूफान की तरह था। लेकिन इस मुश्किल घड़ी में रियासत के राजनेता जनता से कोसों दूर थे। किसी भी दल के नेताओं ने जनता की तकलीफों को समझने और उन्हें बांटने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसी बेरुखी ने आग में घी का काम किया। श्रीनगर में कम मतदान का रिकार्ड बनाने के बाद अनंतनाग में चुनाव न होने देकर यह अहसास कराया गया कि सरकार के बूते का कुछ नहीं है।
फारूक अब्दुल्ला जैसे राजनेताओं के बयानों ने भी बहुत कुछ बिगाड़ा। तीन पीढि़यों की जिंदगी को जहन्नुम बनते देख चुकी अवाम पाकिस्तान परस्तों से त्रस्त है और सरकारों से नाउम्मीद। फिर भी उसे रियासत और मुल्क के निजाम से उम्मीदें लगाना ज्यादा मुनासिब लगा। कश्मीर में उठीं मौजूदा लपटों की असली वजह यही है। आतंकी तंजीमों और पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों की बौखलाहट ने कश्मीर को फिर सुलगा दिया है।
तो क्या पांच जिलों का तनाव ही है कश्मीर की समस्या?
कश्मीर में हिंसक प्रदर्शन
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कश्मीर में भड़की हिंसा की एक हकीकत यह भी है कि यह केवल चार जिलों की हिंसा है। अनंतनाग, शोपियां, पुलवामा और कुलगाम के अलावा श्रीनगर के कुछ हिस्से छोड़ दें तो कश्मीर के शेष जिलों में हालात बिलकुल जुदा हैं। वहां आतंकियों और उनके आकाओं की एक नहीं चलती।
आतंक से सबसे ज्यादा पीडि़त जिले अनंतनाग में अगर लड़कियां फुटबाल खेलते दिखती हैं तो यकीनन यह बदलाव की बेहद खुशगवार बयार है। दंगल गर्ल जायरा वसीम के साथ जब पूरा देश खड़ा हुआ तो सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वालों को मुंह छिपाने की भी जगह नहीं मिली। सोशल मीडिया पर भी आतंकियों और उनके हिमायतियों को मुंहतोड़ जवाब मिल रहा है। आतंकियों का नायकत्व टूट रहा है। अलगाववादियों की हैसियत खत्म हो रही है। इसी की तो छटपटाहट है।
अब एक तरफ पाकिस्तान और उसके पैसे पर पलने वाले आतंकी व अलगाववादी कश्मीर की आग को भड़काने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ केंद्र से मिली हरी झंडी के बाद आतंकियों को चुन-चुनकर खत्म करने में जुटी सेना और सुरक्षा बल हैं। इनके बीच में जरूरत है एक समझदार, संवेदनशील और मजबूत राजनीतिक पहल की। इसके लिए यही सबसे माकूल समय है। जनता में यह भरोसा जगाना होगा कि सरकार उनकी मुहाफि़ज है। कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत जुमला नहीं जज्बा है। ऐसा हो सका तो कश्मीर समस्या का समाधान तो होते-होते होगा, लेकिन जन्नत फिर से जन्नत तो तुरंत ही लगने लगेगी।