गर्मियों में गुलजार रहने वाली डल झील के किनारे सन्नाटा पसरा है। इक्के-दुक्के पर्यटक दिखते हैं लेकिन उनकी आंखों में दहशत की परत साफ महसूस की जा सकती है। एक अनजाना खौफ सताता है। कहीं कुछ हो न जाए का डर ठिकाने तक महफूज पहुंचने में एक जल्दीबाजी पैदा करता है। छोटे कारोबारियों का धंधा चौपट हो चुका है। डल किनारे लंबी कतार में सूने पड़े शिकारे आतंक के चोट की कहानी बांच रहे हैं।
कश्मीर में आतंक नए युग में प्रवेश कर चुका है। इस युग में आतंकियों के जनाजों में तो हजारों की भीड़ जुट रही है, लेकिन पर्यटकों की आमद पर ग्रहण लग गया है। स्कूलों और कालेजों के परिसर भी विषाक्त हवा की चपेट में हैं। आजादी का नारा इस्लाम के लिए जंग में तब्दील होने का खतरा बढ़ गया है। अलगाववाद के जहर ने नई पीढ़ी को सबसे अधिक प्रभावित किया है। डल झील के हाउस बोट खाली पड़े हैं।
शिकारे से होने वाली आमदनी पर गुजर-बसर करने वाले 58 साल के मोहम्मद शफी रोज अहले सुबह डल के नेहरू पार्क के सामने घाट में अपनी बस्ती में लौट जाते हैं। चार दिन से एक पैसे की भी आमदनी नहीं हुई। खाली हाथ घर लौटने की मजबूरी की चपेट में अन्य शिकारे वाले भी हैं। शफी कहता है कि डल घुमाने की दर घटा दी है, लेकिन कोई आए तभी तो आमदनी होगी।
होटल खाली, टैक्सी वालों की रोजी पर मार
कश्मीर में पर्यटन पर असर
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बेमिना डिग्री कालेज के छात्र मुदस्सर के परिवार की भी रोजी-रोटी शिकारे से ही जुड़ी है। मुदस्सर ने कहा कि कालेजों से निकलने वाले पत्थरबाज गिने-चुने हैं। हमें तो सुकून भरी जिंदगी चाहिए, लेकिन हर बार पीक सीजन को खा जाती है हड़ताल। पिछले साल बुरहान वानी की मौत ने सीजन चौपट कर दिया और इस बार तो हर दिन हादसा है। जब भी आतंकी हमला होता है तो जो टूरिस्ट कश्मीर में हैं वे भी सामान समेटने लगते हैं। उनके घर से बुलावा आने लगता है कि हालात बिगड़ गए हैं, जल्दी लौट आओ।
अलगाववादियों के बंद और आतंकियों की बंदूकों ने रोज कमाकर खाने वाले तबके को सबसे अधिक परेशान किया है, लेकिन होटल वाले भी परेशान हैं। डल किनारे के अधिकांश होटल खाली पड़े हैं। टूर एंड ट्रेवल एसोसिएशन के फारूक अहमद का कहना है कि गुलमर्ग, सोनमर्ग और पहलगाम के लिए टैक्सियां बुक नहीं हो रहीं हैं।
व्यापार 2 प्रतिशत पर आ गया है। निजी टैक्सियों की तो छोड़िए डल किनारे पर्यटकों को घुमाने वाली सरकारी बस को भी पैसेंजर नहीं मिलते। पहले इस बस की छत ठसाठस भरी होती थी। पर्यटक चलसी बस की छत पर खड़े होकर नजारा लेते थे। अब तो बस का क्लीनर पैसेंजर के लिए चिल्लाता रह जाता है, बस खाली घूमती है।