जल संसाधन के अकूत भंडार होने पर भी रियासत की अपनी झोली खाली है। सिंचाई और बिजली के लिए पानी का दोहन तो खूब हो रहा है, लेकिन पड़ोसियों की खातिर।
झेलम, सिंधु और चिनाब नदियों से जहां पाकिस्तान की चांदी है, वहीं भारतीय नियंत्रण वाली रावी नदी से पंजाब के घर रोशन और खेत खलिहान लहलहा रहे हैं। पानी सामने से बहकर निकल जाता है, लेकिन रियासत प्यासी रह जाती है।
उड़ी हमले के बाद जिस तरह से सिंधु जल संधि के मुद्दे पर केंद्र ने संधि तोड़ने तक के संकेत दिए हैं, उससे रियासत को हो रहे नुकसान का मुद्दा फिर से खड़ा हो गया है, लेकिन पाकिस्तान नियंत्रण वाली नदियों से इतर यदि भारतीय नियंत्रण वाली रावी नदी की बात करें तो रियासत दशकों से खुद को ठगा सा महसूस करने को मजबूर है।
सिंधु जल संधि से पाक, अंतरराज्यीय समझौते से पंजाब की मार
सिंधु जल समझौता
- फोटो : File Photo
सिंधु जल संधि से जो व्यवस्था चल रही है, उससे राज्य को बिजली उत्पादन क्षेत्र में 18 हजार मेगावाट क्षमता के बिजली उत्पादन की संभावना से हाथ धोना पड़ रहा है। राज्य में सिंचाई के लिए पानी के लिए हाहाकार की स्थिति है।
वर्तमान में कुल बिजली उत्पादन 3600 मेगावाट हो रहा है जिसमें से एनएचपीसी संचालित प्रोजेक्ट लगभग दो हजार मेगावाट बिजली पैदा कर रहे हैं। इसका कुछ अंश ही राज्य को मिलता है। इसी तरह से रावी नदी पर पंजाब के संचालन में चल रहे 600 मेगावाट क्षमता वाले रणजीत सागर बांध प्रोजेक्ट से 20 फीसदी बिजली राज्य को दी जानी थी।
प्रोजेक्ट वर्ष 2000 में कमीशन हुआ, लेकिन आज तक एक यूनिट बिजली भी रियासत को नहीं मिल पाई है।दरअसल सिंधु जल संधि के तहत जिन तीन नदियों के पानी का नियंत्रण भारत के पास है, उसमें जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले से बहकर निकलने वाली रावी नदी भी शामिल है। पंजाब सरकार ने रावी पर बांध बनाने के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार के साथ वर्ष 1973 और 1979 में समझौता किया।
पंजाब ने पूरा नहीं किया नुकसान भरपाई का वादा
सिंधु जल समझौता
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इसके समझौते के तहत रणजीत सागर बांध निर्माण के एवज में पंजाब सरकार ने नुकसान की भरपाई करने का लिखित में वादा किया। लगभग चार दशक बीत जाने के बावजूद ये वादे अधूरे हैं।
जम्मू-कश्मीर विधान परिषद के तत्कालीन पर्यावरण समिति ने विस्तृत निरीक्षण और अध्ययन के बाद नुकसान का जो आकलन तैयार किया, उसके मुताबिक जम्मू-कश्मीर सरकार को बांध परियोजना से 17 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। पंजाब सरकार के साथ समझौते के मुताबिक 22 प्रभावित गांवों के विस्थापित 1802 परिवारों को उचित मुआवजा और रोजगार की सुविधा दी जानी थी। दशकों बाद भी अधिकांश मामले अधर में लटके हुए हैं।
सिंचाई के लिए जो समझौता हुआ, उसकी पंजाब ने वादाखिलाफी की। नतीजतन 53 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचाई के पानी को तरस गई। कायदे से 1150 क्यूसिक पानी जम्मू-कश्मीर को मिलना था, जबकि हकीकत में मुश्किल से 200 क्यूसिक पानी ही पंजाब की मर्जी पर नहर में छूटता है।