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Jammu News: जीत के बाद अगले मुकाबले पर नाजिया की नजर, सरकार से की नौकरी और सिंथेटिक ग्राउंड की मांग

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घर पर लग रहा बधाई देने वालों का तांता, कौम के लिए मिसाल बता रहा गुज्जर-बकरबाल समाज
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गौरव रावत
जम्मू। नगरोटा की नाजिया बीबी को खो-खो वर्ल्ड कप जीते नौ दिन से ज्यादा हो चुके हैं। नाजिया के घर दिल्ली से लौटकर आने के बाद से ही बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। सांसद, डीआईजी और कई स्थानीय नेताओं ने उनके घर पहुंचकर उन्हें बधाई दी है। गुज्जर-बकरवाल समाज के नेता और अधिकारी भी उनके गांव पहुंच रहे हैं और उन्हें समाज के लिए मिसाल बता रहे हैं। अमर उजाला ने भी बन टोल प्लाजा के पास हाईवे किनारे बसे छोटे से गांव कला कुप्पड़ में पहुंचकर नाजिया के संघर्ष और आगे की तैयारियों पर उनसे बात की। पेश हैं बातचीत के कुछ अंश-


1. जिस समाज और पृष्ठभूमि से आप आतीं हैं, उसमें महिलाओं के लिए पढ़ाई कर पाना ही बड़ी चुनौती है। ऐसे में आपने पढ़ाई के साथ-साथ खेल में इतनी बड़ी सफलता कैसे हासिल की?
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- ये बात सही है कि गुज्जर-बकरबाल पढाई के मामले में बाकी समाजों के काफी पीछे हैं। आधे साल हम लोग जम्मू संभाग में होते हैं और आधे साल कश्मीर में। ज्यादातर परिवार पशुपालन पर ही निर्भर हैं, इसलिए लड़किया तो छोड़िये लड़के भी पढ़ाई जारी नहीं रख पाते। फिर भी शुरू से ही मेरे परिवार का मुझे पढाई-लिखाई और खेल दोनों के मामले में काफी सहयोग मिला। मेरी पांचवीं तक की पढ़ाई गांव के ही स्कूल से हुई। उसके बाद में पढ़ाई के लिए जम्मू शहर चली गई। यहां गुज्जर-बकरबाल हॉस्टल में रहकर आगे की पढाई पूरी की। खेल जारी रखने में सबसे बड़ी समस्या कपड़ों को लेकर थी। चूंकि गांव में ज्यादातर लोगों की सोच रूढ़िवादी है, इसलिए टीशर्ट और शॉर्ट पहनकर खेलना, लोगों के लिए अचंभे से कम नहीं था। इसको लेकर लोगों ने फब्तियां भी कसी, लेकिन मेरा और मेरे परिवार का मनोबल नहीं टूटा। इसी का नतीजा है कि में पढाई के साथ-साथ खेल भी जारी रख पाई और आज इस मुकाम पर हूं।

2. जब से आप घर लेकर आईं है, तबसे बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। आपके घरवालों का इस सब पर क्या प्रतिक्रिया है?
- घरवालों ने मेरे संघर्ष को बड़े नजदीक से देखा है, इसलिए सभी थोड़े भावुक भी हैं और मेरे ऊपर गर्व भी कर रहे हैं। मैं विश्वकप में भाग लेने वाली प्रदेश की पहली खो-खो खिलाड़ी हूं। इसलिए अधिकारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि और नेता भी मुझे और घरवालों को बधाई देने के लिए गांव में आ रहे हैं। मेरे समाज के लिए यह उपलब्धि बहुत बड़ी है, इसलिए दूरदराज से गुज्जर-बकरवाल समाज के लोग यहां आ रहे हैं। इससे सभी घरवालों खुश होना बहुत लाजिमी है। मुझे भी बहुत खुशी है कि घरवालों ने मुझपर जो भरोसा दिखाया, मैं भी उसपर खरी उतर सकी।

3. आपके हिसाब से आपकी सफलता के बाद आपके समाज में लड़कियों को शिक्षा और खेल जैसे क्षेत्रों में और ज्यादा अवसर मिलेंगे?
- लड़कियों की शिक्षा के प्रति सभी समाजों में स्थिति बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है। शहरों में फिर भी लड़कियों के लिए शिक्षा सुलभ है। गांव-देहात और दूरदराज के क्षेत्रों में कैसा माहौल है, यह किसी से छुपा नहीं है। अगर घरवाले लड़की को पढ़ाना भी चाहें तो आसपास स्कूल-कॉलेज न होने या कॉलेजों तक वाहनों की सुविधा ना होने की वजह से पढ़ाई छूट जाती है। गुज्जर-बकरवाल समाज में 90 फीसदी से ज्यादा लोगों के पास जमीनें नहीं हैं। लोग पशुपालन पर ही निर्भर हैं। ऐसे में लोगों के लिए अपने बच्चों का पेट भर पाना ही पहली चुनौती है। पढाई-लिखाई के बारे में तो लोग उसके बाद सोचेंगे। फिर भी मुझे लगता है कि शायद जिन लोगों तक मेरी कहानी पहुचं जाएं वो पढाई और खासकर के खेल के क्षेत्र में जाने से लड़कियों को नहीं रोकेंगे।
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4. अब आगे के लिए आपकी क्या योजना है। साथ ही खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार को क्या सुझाव देना चाहेंगी?
- मैं आगे भी खो-खो खेलना जारी रखूंगी। अभी तो किसी चैंपियनशिप या प्रतियोगिता की तारीख नहीं आई है, लेकिन मेरी तैयारी जारी है। सरकार और खो-खो एसोसिएशन का मुझे पूरा सहयोग मिला। उसी की बदौलत में भारतीय टीम में चयनित हुई। हालांकि जम्मू में खो-खो के लिए सिंथेटिक ग्राउंड नहीं है। हम यहां मिट्टी के मैदान में तैयारी करते हैं। बड़े मुकाबलों में खेलने के बाहर जाते हैं तो वहां सिंथेटिक ग्राउंड पर ही खेलना होता है। इसलिए तालमेल बिठाने में थोड़ी दिक्कत होती है। जम्मू में अगर सिंथेटिक ग्राउंड होगा तो यहां के खलाड़ी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और अच्छा प्रदर्शन कर पांएगे। इसके अलावा सरकार को खिलाडियों को नौकरी देने की सही नीति बनानी होगी। मैं सरकार से अपने लिए भी नौकरी की मांग करती हूं। साथ ही नौकरी भी खिलाडियों को उनके स्तर के हिसाब से दी जाए। मैं खुद गजेटेड अधिकारी से कम की नौकरी स्वीकार नहीं करूंगी।
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