सदन से लेकर सड़क तक इस वक्त अनुच्छेद 370 का शोर है। हर कोई मानता है कि इसकी वापसी आसान नहीं रह गई है, लेकिन अपने-अपने मतदाताओं का भरोसा हासिल करने के लिए यह सियासत का मुद्दा बना रहेगा। विभिन्न दल अपनी राजनीतिक रोटियां इसकी आंच पर सेंकते रहेंगे।
ये सब जानते हैं कि इसे संसद में एक निश्चित प्रक्रिया के तहत ही हटाया गया है। इसे लागू करना असेंबली के अधिकार क्षेत्र में नहीं और जब तक केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, इसकी बहाली के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है।
मान भी लें कि आने वाले कुछ वर्षों में केंद्र में यदि कोई दूसरा दल सरकार बनाता भी है तो अगले 10 वर्षों में दरिया में पानी इतना बह चुका होगा कि इसकी बहाली का अनुमान लगाना मुश्किल होगा। विधानसभा चुनाव हो चुके, सभी दलों ने अपने-अपने जनाधार को परख लिया है। उसी आधार पर आगामी पंचायत चुनावों के लिए भी पार्टियां खुद को तैयार करने में जुट गई हैं।
जहां तक राजनीतिक दलों की बात है तो पीडीपी की जरूरत है कि किसी तरह से वो खुद को जम्मू-कश्मीर की जनता के बीच बनाए रखे। होड़ में रखकर श्रेय लेने की राजनीति करना कोई पार्टी प्रमुख से सीखे। वहीं भाजपा की अपनी वैचारधारा है, जिससे न तो वो मुंह मोड़ेगी और न ही उसकी कोई मजबूरी है।
'370 का इतिहास कोई नया नहीं'
उमर सरकार को जरूर पार्टी के व सांविधानिक दायित्व निभाने हैं। गठबंधन में रहकर भी मौन रहना कांग्रेस की मजबूरी है, क्योंकि समर्थन उसे देशद्रोही करार देगा। बोलकर वो गठबंधन के धर्म से विमुख नहीं हो सकती। वरिष्ठ पत्रकार संत कुमार शर्मा कहते हैं कि 370 का इतिहास कोई नया नहीं।
'सिर्फ सियासत नहीं बल्कि कोरी सियासत है'
सातवें संविधान संशोधन 1956 के जरिए अनुच्छेद 306 को समाप्त किया गया था। इसी अनुच्छेद के साथ 306ए को जोड़ा गया। बाद में अनुच्छेद 370 बना। ये भी तो अलग तरीके की सियासत थी कि 306 को हटाया गया, लेकिन उसके सहयोगी अनुच्छेद को नहीं हटाया गया। वर्तमान में जो कुछ भी हो रहा है, वो सिर्फ सियासत नहीं बल्कि कोरी सियासत है।
इमोशनल इश्यू बनाकर सिर्फ वोटबैंक के लिए 370 का मुद्दा जिंदा रखा
जम्मू-कश्मीर की सियासत में नेतृत्व संभालने वालों ने 370 का खूब इस्तेमाल किया है। यही वजह है कि इन चर्चाओं को खत्म नहीं किया जा रहा है। वास्तव में इस पर उमर अब्दुल्ला को स्पष्ट तौर पर राजनीतिक मंतव्य स्पष्ट करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। विकास के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए भाजपा हो या जम्मू-कश्मीर के अन्य दल, उन्हें जनता का दिल जीतना चाहिए।
भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी व राजनीतिक विश्लेषक केबी जिन्दियाल कहते हैं कि अब विराम लगना चाहिए इस पर, बहुत हो गया। सिर्फ संसद को है, इसे लेकर फैसले का अधिकार। कश्मीर लीडरशिप ने लोगों को गुमराह किया है, इसे लेकर, इसे इमोशनल इश्यू बनाकर जिंदा रखा, सिर्फ वोट बैंक के लिए।
पीडीपीः खुद को जिंदा रखने की जद्दोजहद से ज्यादा कुछ नहीं
विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले ये अनुमान लगाया गया था कि हंगामा हुआ तो भी उपराज्यपाल के अभिभाषण के बाद होगा। हुआ कुछ उल्टा। पीडीपी विधायक वहीद पर्रा ने 370 की बहाली के पक्ष में प्रस्ताव पेश कर दिया। जिस तरह से एक्स पर पीडीपी प्रमुख ने पर्रा के इस एक्शन पर गर्व जताया, उससे ये साफ है कि यह सबकुछ सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। इसी क्रम में इल्तिजा का बयान आया कि जो 50 विधायकों वाली पार्टी नहीं कर सकी, वो हमने कर दिया।
दरअसल यह प्रत्यक्ष तौर पर नेकां से होड़ लेने और खुद को साबित करने की छटपटाहट है। बुधवार को नेशनल कांफ्रेंस प्रस्ताव ले आई। होड़ में पिछड़ जाने से डरी पीडीपी ने फिर एक नया प्रस्ताव सदन में रखवाया और कहा कि बुधवार को उमर सरकार द्वारा पेश किया गया प्रस्ताव अधूरा था।
भाजपा के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता, इसके वापस होने का सवाल नहीं
जिस वक्त ये सुगबुगाहट शुरू हुई थी कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद का चेहरा होंगे, उसी दौरान पंजाब में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 60वीं जयंती मनाई जा रही थी। उस वक्त उन्होंने मंच से श्यामा प्रसाद के बलिदान को याद करते हुए संबोधन शुरू किया था। भारतीय जनता पार्टी ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ चलने का संकेत दे दिया था, साथ ही कश्मीर के प्रति अपने नजरिए को स्पष्ट कर दिया था। जब उमर सरकार या अन्य दल अनुच्छेद 370 को छोड़ नहीं पा रहे है तो ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के लिए तो इसे छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता।
नेशनल कॉन्फ्रेंसः सरकारी दस्तावेज में तो उमर सरकार ने शामिल ही नहीं किया इसे
सियासत का एक तरीका ये भी है, जो उमर अब्दुल्ला के सियासी कौशल में देखने को मिल रहा है। बुधवार को देशभर में ये हल्ला होता है कि जम्मू-कश्मीर में 370 की वापसी होगी, क्योंकि उमर सरकार ने विशेष दर्जा बहाली के प्रस्ताव को पास कर दिया है। दरअसल प्रस्ताव के सरकारी दस्तावेज को यदि ध्यान से पढ़ा जाए तो उसमें कहीं इस शब्द का जिक्र ही नहीं है। विशेष दर्जा व सांविधानिक गारंटी की बात कही गई है।
दरअसल ये दोनों मांगें अनुच्छेद 371 के तहत आती हैं। घोषणा पत्र में स्पष्ट तौर पर 370 का जिक्र किया है नेकां ने, जबकि सदन में लाए गए प्रस्ताव में इस शब्द का इस्तेमाल ही नहीं किया गया है। चुनाव जीतने से लेकर अब तक यदि उमर अब्दुल्ला के एक-एक बयान पर गौर करें तो यह हमेशा स्पष्ट रहा है कि वे इस मुद्दे पर केंद्र से जंग नहीं चाहेंगे। उन्हें अपनी सांविधानिक सीमाएं मालूम हैं।