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जमानत नहीं, जेल का सिद्धांत यूएपी एक्ट में लागू नहीं : हाईकोर्ट

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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि ‘जमानत नहीं, जेल’ का सिद्धांत गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम यूएपी एक्ट के मामलों में लागू नहीं होगा। जस्टिस राजनेश ओसवाल और जस्टिस संजय परिहार की खंडपीठ ने यह टिप्पणी शोपियां के बिलाल अहमद कुमार और अनंतनाग के तौफीक अहमद लावे द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए की।
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ये अपीलें विशेष जज (यूएपीए) अनंतनाग द्वारा 11 नवंबर 2024 को जमानत खारिज करने के सामान्य आदेश के खिलाफ दायर की गई थीं। मामला पुलिस स्टेशन बिजबिहाड़ा में दर्ज है। आरोपियों ने जमानत खारिज करने के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी थी कि वे चार साल से अधिक समय से मुकदमे का सामना कर रहे हैं और जमानत खारिज करने का आदेश मामले के तथ्यों और परिस्थितियों की समीक्षा किए बिना पारित किया गया।

खंडपीठ ने कहा, गुरिंदर के मामले (गुरिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य और अन्य 2024) में निर्णय के अनुसार, धारा 43D (5) यह सुनिश्चित करती है कि ‘आरोपी व्यक्ति को जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा’, जिसका अर्थ है कि इस तरह के मामलों में ‘जमानत नहीं, जेल’ का सिद्धांत लागू नहीं होगा।
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कोर्ट ने कहा, इसलिए, सामान्य दंडात्मक अपराधों के लिए जमानत देने का पारंपरिक सिद्धांत यूएपी एक्ट के मामलों में कोई स्थान नहीं रखता। ऐसे अपराधों में जमानत देने का सामान्य सिद्धांत अत्यंत सीमित दायरे में लागू होता है।

खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद देखा कि आरोपियों के कब्जे से हथगोला और विस्फोटक सामग्री बरामद की गई थी। साथ ही यह भी आरोप है कि दोनों एक ऐसे मॉड्यूल का हिस्सा थे, जिसमें सक्रिय आतंकवादी (एजाज अहमद वानी, रईस अहमद भट) शामिल थे, जो 2021 में एक मुठभेड़ में मारे गए थे।
कोर्ट ने कहा, आरोपियों के कब्जे से विस्फोटक पदार्थ की बरामदगी ने धारा 23 (कठोर दंड) और धारा 18 के तहत अपराध को जन्म दिया, जो कहती है कि ‘जो कोई भी आतंकवादी कृत्य करने या आतंकवादी कृत्य की तैयारी के लिए षड्यंत्र करता है, उसे कम से कम पांच साल की कैद या आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा दी जाएगी। इसी तरह धारा 39 आतंकवादी संगठन को समर्थन देने से संबंधित है। कोर्ट ने कहा, ऐसे साक्ष्यों से आरोपियों की अपराध में संलिप्तता स्पष्ट होती है।
खंडपीठ ने कहा कि आरोपियों के मामले को एक अन्य दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए। गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1967 का उद्देश्य आतंकवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाना और ऐसी गतिविधियों के प्रति शून्य सहनशीलता सुनिश्चित करने के लिए कठोर कानून बनाना है। कोर्ट ने कहा, ऐसी गतिविधियां जनता में असुरक्षा पैदा करती हैं, जिससे लोग आतंकित महसूस करते हैं और ऐसी संगठनों के इरादों का पालन करने को मजबूर होते हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाना और राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता को कमजोर करना है। कोर्ट ने कहा, अदालत का कर्तव्य है कि विचाराधीन कैदी के स्वतंत्रता के अधिकारों को संतुलित करते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता के साथ-साथ जनता की शांति और स्थिरता से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
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