श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने श्रीनगर में 88 लाख रुपये से अधिक की धोखाधड़ी वाली भूमि हेराफेरी के मामले में आरोपी तहसीलदार (राजस्व अधिकारी) की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।
न्यायमूर्ति जावेद इकबाल वानी की पीठ ने कहा कि आरोपों की गंभीरता, जांच का चरण, और धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश व भ्रष्टाचार जैसे अपराधों की प्रकृति को देखते हुए याचिकाकर्ता, नुसरत अजीज, अग्रिम जमानत की सुविधा की हकदार नहीं हैं।
मामला एक शिकायत से शुरू हुआ, जिसमें दावा किया गया कि शिकायतकर्ता ने 2012 में बालहामा में 5 कनाल और 4 मरला जमीन बैंक भुगतान और जमीन के आदान-प्रदान के जरिए खरीदी थी। हालांकि, बिक्री दस्तावेजों को अपडेशन के लिए वापस करने के बाद, राजस्व अधिकारियों ने कथित तौर पर निजी पक्षों के साथ मिलकर दस्तावेजों में हेराफेरी की।
श्रीनगर के आर्थिक अपराध शाखा (क्राइम ब्रांच) की जांच में पता चला कि तत्कालीन तहसीलदार नुसरत अजीज और एक पटवारी ने राजस्व रिकॉर्ड में एक फर्जी म्यूटेशन (नंबर 2163/1) अवैध रूप से दर्ज किया था, ताकि एक व्यक्ति को लाभ पहुंचाया जा सके, जिसने बाद में उस जमीन का हिस्सा किसी अन्य खरीदार को बेच दिया।
तलाशी के दौरान, आपत्तिजनक दस्तावेज और तहसीलदार का पासपोर्ट जब्त किया गया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उन्हें व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण झूठा फंसाया जा रहा है और उन्होंने लंबी सेवा, स्वच्छ छवि, स्वास्थ्य स्थिति और महिला होने के आधार पर राहत मांगी।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उनकी पिछली जमानत याचिका को जल्दबाजी में खारिज कर दिया गया था। हालांकि, उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के अग्रिम जमानत से संबंधित नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि इस चरण में निर्दोषता के दावों को सत्य मानना उचित नहीं है और जांच को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ना चाहिए। अदालत ने फैसला सुनाते हुए याचिका खारिज कर दी आरोपों की प्रकृति, अपराध की गंभीरता और जांच का चरण अग्रिम जमानत देने के पक्ष में नहीं हैं।