जम्मू, मीरा साहिब। गांव खारिया पहुंचते ही हर गली में असामान्य खामोशी महसूस हुई। लोग धीमी आवाज में बात कर रहे थे और कदम खुद-ब-खुद अंजलि चौधरी के घर की ओर बढ़ रहे थे। जिस घर से सुबह हंसी-खुशी बेटी निकली थी, वहां अब सिसकियों और विलाप की आवाजें गूंज रही थीं।
अंजलि के घर के आंगन में महिलाएं जमीन पर बैठी रो रही थीं। मां रेखा चौधरी को आसपास की महिलाएं संभालने की कोशिश कर रही थीं लेकिन वे बार-बार बेसुध होकर एक ही बात दोहरा रही थीं कि सुबह तक सब ठीक था, किसी ने सोचा भी नहीं था कि ऐसा दिन देखना पड़ेगा। उनकी आवाज में ऐसा दर्द था कि वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। घर के एक कोने में पिता नरेश चौधरी चुपचाप बैठे थे। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे लेकिन मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था। पास ही चाचा चरण सिंह और अन्य परिजन भी खामोशी में डूबे बैठे थे। दादा जागीर सिंह ने कांपती आवाज में कहा कि पोती के जाने से घर का चिराग बुझ गया और आंगन सूना हो गया है।
घर के बाहर खड़े लोग आपस में धीमी आवाज में अंजलि की बातें कर रहे थे। एक पड़ोसी ने बताया कि वह बहुत मिलनसार बच्ची थी, हर किसी से हंसकर बात करती थी।”पास खड़े एक बुजुर्ग ने कहा कि इतनी समझदार और संस्कारी लड़की पूरे गांव में नहीं थी, उसकी कमी हमेशा महसूस होगी। सुबह से ही गांव के लोग अपने काम छोड़कर यहां पहुंचने लगे थे। कोई परिवार को ढांढस बंधा रहा था, तो कोई चुपचाप खड़ा होकर इस दुख में शामिल हो रहा था। गांव के पूर्व पंच हरि चंद और चौ. प्यारा लाल भी मौके पर पहुंचे और परिजनों से मिलकर संवेदना व्यक्त की। शाम ढलने के साथ ही गांव में सन्नाटा और गहरा हो गया। अंजलि के घर से उठती सिसकियां दूर तक सुनाई देती रहीं और हर गुजरते पल के साथ यह एहसास और गहरा होता गया कि इस घर की खुशियां एक झटके में छिन गईं।