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जम्मू-कश्मीर : रोहिंग्याओं ने फर्जी और दूसरों के आधार नंबर पर ले लिए सिम कार्ड 

Wed, 17 Mar 2021 02:01 AM IST
दुष्यंत शर्मा बृजेश कुमार सिंह, जम्मू

सार

  • जांच में सामने आए करीब सौ मामले, अब आधार कार्ड देने वालों पर भी कार्रवाई की तैयारी
  • जम्मू में रोहिंग्याओं की वेरिफिकेशन के साथ कई पहलुओं की जांच कर रही हैं सुरक्षा एजेंसियां 
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एक रोहिंग्या बस्ती .. - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जम्मू में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्याओं ने फर्जी आधार नंबर पर फोन सिम कार्ड ले रखे हैं। होल्डिंग सेंटर भेजे गए रोहिंग्याओं के मोबाइल फोन नंबरों की जब जांच में यह खुलासा हुआ है। जांच में पाया गया कि कई रोहिंग्याओं ने फर्जी आधार कार्ड तो कई ने दूसरों के आधार नंबर पर सिम कार्ड ले लिए हैं।

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करीब सौ मामले ऐसे सामने आए हैं। अब रोहिंग्याओं को आधार कार्ड उपलब्ध कराने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की तैयारी है। सुरक्षा एजेंसियां रोहिंग्या वेरिफिकेशन के साथ कई पहलुओं पर जांच कर रही हैं।

सरकार से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि आधार लागू होने के दौरान जम्मू-कश्मीर में नियमों में ढील के चलते कई रोहिंग्या फर्जी तरीके से आधार कार्ड बनवाने में सफल रहे हैं। इसके लिए उन्होंने पैसे भी खर्च किए। लेकिन जिनके आधार कार्ड नहीं बन पाए उन्होंने दूसरे के नाम पर विभिन्न कंपनियों के सिम ले लिए। कुछ ने तो पोस्टपेड सिम भी हासिल किए हैं। 
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सूत्रों ने बताया कि जांच के दौरान लगभग सभी रोहिंग्याओं के पास मोबाइल फोन पाए गए। जिस आधार पर उन्होंने सिम खरीदे उन कागजातों की जांच करने पर सुरक्षा एजेंसियों की आंखें खुली रह गईं। पाया गया कि उन्होंने फर्जी कागजात के आधार पर सिम हासिल किए हैं। शक है कि एक ही कागजात पर कई रोहिंग्याओं ने सिम हासिल किए हैं। 

सभी नंबरों की होगी जांच, मददगारों का भी लगेगा पता
सरकार से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि रोहिंग्याओं के पास मौजूद सभी नंबरों की जांच कराई जाएगी। यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि और कितनों के पास दूसरे लोगों के कागजात हैं  जिनके आधार पर वे यहां सुविधाएं हासिल कर रहे हैं। इन्हें रोहिंग्याओं के मददगार के रूप में देखा जा सकता है। 

सुरक्षा को खतरा
आतंकवाद प्रभावित जम्मू-कश्मीर में सिम लेने के लिए नियमों में सख्ती के बाद भी सिम जारी होने को खतरे की घंटी माना जा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में किसी वारदात के बाद इनके बारे में पता लगाना भी मुश्किल होगा। कई स्थानों पर रोहिंग्याओं की बस्ती सुरक्षा प्रतिष्ठानों से कुछ ही दूरी पर हैं।

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