जम्मू। करोड़ों के ऋण घोटाले में जम्मू कश्मीर बैंक राजोरी के पूर्व शाखा प्रबंधक जतिंदर सिंह को अदालत ने जमानत देने से इंकार कर दिया है। विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निरोधक जम्मू हक नवाज जरगर ने सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यदि आवेदक को अभी जमानत पर रिहा किया जाता है, तो इससे चल रही जांच पर प्रभाव पड़ने की संभावना है।
अदालत के लिए आरोपी के संचार स्रोतों की निगरानी करना जरूरी है, क्योंकि सह-आरोपियों में मोहम्मद सफीर अभी फरार है। जो सबूताें से छेड़छाड़ कर सकता है। भविष्य में कुछ और गिरफ्तारियां होने की संभावना है क्योंकि जांच एजेंसी ने पहले ही इस अदालत के संज्ञान में ला दिया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17-ए के तहत मंजूरी पहले ही अन्य बैंक कर्मचारियों के लिए प्राप्त की जा चुकी है। जिन्होंने संबंधित शाखाओं में काम किया था। जाहिर है इस स्तर पर आवेदक के पक्ष में जमानत देने के लिए विवेकाधिकार का प्रयोग करने से जांच पर प्रभाव पड़ेगा, जिससे ऐसे सफेदपोश अपराधियों का हौसला और बढ़ जाएगा। चूंकि जांच बड़ी साजिश को सामने लाने के लिए चल रही है। आने वाले दिनों में कुछ और बैंक अधिकारियों की संलिप्तता सामने आने की संभावना है। ऐसी परिस्थितियों में वर्तमान आरोपी जमानत के हकदार नहीं हैं।
आवेदक के वकील की इस दलील में कोई दम नहीं दिखता कि वह गवाहों को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं है। अन्य आरोपियों व बैंक कर्मचारियों और लेन-देन के लाभार्थियों की संलिप्तता की भी जांच की जा रही है। अगर आरोपी को इस स्तर पर जमानत पर रिहा किया जाता है, तो वह निश्चित रूप से अपने सहयोगियों और लाभार्थियों को सूचित कर सकता है, जो कथित तौर पर उसके संपर्क में थे।
ऐसा भ्रष्ट रवैया बर्दाश्त नहीं
भारत में बैंकिंग प्रणाली का विशेष रूप से समाज के मध्यम और निचले तबके के लिए बहुत महत्व है। बैंक में जमा राशि आम आदमी की जेब से मेहनत करके कमाई गई रकम होती है। बैंक अधिकारियों का ये कर्तव्य है कि वे उस भरोसे को बनाए रखें और उसे उचित तरीके से निवेश करें, ताकि जमाकर्ताओं को समय पर उनका हक मिल सके। अगर बैंक अधिकारी जमा राशि का अहम हिस्सा ही खाने लगेंगे तो देश की अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाना संभव नहीं है।
बैंक अधिकारियों की ओर से भ्रष्ट रवैया किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए सीधा खतरा है, जिसके लिए ऐसे अपराधियों के प्रति जीरो टॉलरेंस का रवैया अपनाना जरूरी है।
बैंक पर बना भरोसा तोड़ा
आरोप इस ओर इशारा करते हैं कि आरोपी द्वारा अन्य आरोपियों की मिलीभगत से बैंक के पैसे को व्यवस्थित तरीके से हड़प लिया गया है। बैंक द्वारा अपने कर्मचारी पर जो भरोसा जताया गया था कि वह बैंक और जमाकर्ताओं के पैसे की देखभाल करेगा, वह टूट गया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि न्यायालय को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक हित के बीच संतुलन बनाना होता है, लेकिन न्यायालय द्वारा ऐसे मामलों में नरमी बरतना समाज के साथ अन्याय करने के समान है और मेरी राय में इससे सार्वजनिक हित की पूर्ति नहीं होगी।
जांच करते समय बरतें सावधानी
इस आवेदन को हाथ में लेकर न्यायालय आईजीपी क्राइम के संज्ञान में लाना चाहता है कि आर्थिक अपराधों व घोटालों में आमतौर पर लंबी जांच एक सामान्य मामला है। यह न केवल जांच कौशल की परीक्षा है बल्कि उनके धैर्य की भी परीक्षा है। इसलिए एसआईटी और उसके सदस्यों का गठन करते समय या आईओ की नियुक्ति करते समय उचित सावधानी बरती जानी चाहिए। जेएनएफ