पालीटिक्स आगे बढ़ा रहीं, ये मांगें तो सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहींवरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक संत कुमार शर्मा कहते हैं कि महबूबा मुफ्ती अपनी पाॅलीटिक्स को आगे बढ़ा रही हैं। जो मांग चिट्ठी में महबूबा ने की है, वो तो उमर अब्दुल्ला के अधिकार क्षेत्र में है ही नहीं। जनरल एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट तो मुख्यमंत्री के पास है ही नहीं।
महबूबा बताएं कि किसकी कमेटी की बात हो रही है, आईएएस शामिल नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वो कार्यक्षेत्र में ही नहीं। पुलिस हो या सीआईडी, कोई जवाबदेह है ही नहीं तो कमेटी बनाने से क्या होगा। यह जलेबी बनाई जा रही है। अपनी प्रोजेक्ट करने का तरीकाकश्मीर विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रो. नूर अहमद बाबा कहते हैं कि यासीन मलिक का मामला तो महज सुर्खियों में आने और मुद्दा उठाने का है। मुझे नहीं लगता कि राहुल गांधी इसे गंभीरता से लेकर कुछ करेंगे। इस तरह के पत्र सिर्फ अपनी इमेज को प्रोजेक्ट करने का है।
वे अपनी प्रांसगिकता को बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं। वे जानती हैं कि वे हार चुकी हैं। सदन में प्रस्ताव लाकर भी उन्होंने यही किया। वे मुद्दों को उठाकर ये भी बताने की कोशिश कर रही हैं कि उन्हें लोगों के मुद्दों की चिंता है, सरकार गंभीर नहीं है। मेहदी का अपनी अलग इमेज है। सरकार को पत्र लिखकर वो उसी को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। वे अपनी ही पार्टी को याद दिलाकर ये भी लोगों को बताना चाह रहे हैं कि वे आवाम के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझ रहे हैं।
खतों के दबाव में कुछ बेहतर भी हुआ है
खतों की सियासत के कुछ बेहतर नतीजे भी सामने आए हैं। प्रचार पाने की खत लिखने वाले राजनेता को इसका फायदा मिला या नहीं, इसे छोड़कर देखें तो कई फैसले जनमानस के हित में हो गए। जेकेएएस परीक्षा की आयु सीमा में तीन साल तक की छूट मिल गई। इसी के साथ जम्मू-कश्मीर पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा में आयु सीमा में छूट भी मिल गई। शीतजोन के लोगों को नवंबर-दिसंबर में परीक्षा देने का मौका मिल गया। लेक्चरर की भर्ती और डाक्टरों की नियुक्ति को भी सरकार की प्राथमिकता पूरी करने के दबाव के रूप में देखा जा रहा है।