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चिट्ठियों की सियासत: राजनीतिक दलों के बीच चिट्ठियों का दौर जारी, महबूबा और मेहदी का उमर अब्दुल्ला पर दबाव

Tue, 12 Nov 2024 02:53 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो चिट्ठियों की सियासत: राजनीतिक दलों के बीच चिट्ठियों का दौर जारी, महबूबा और मेहदी का उमर अब्दुल्ला पर दबाव

सार

जम्मू-कश्मीर में नई सरकार के गठन के बाद राजनीतिक दलों के बीच चिट्ठियों का दौर तेज हो गया है। आगा रुहल्लाह मेहदी और महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को पत्र लिखकर अपनी मांगें रखी हैं। 
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महबूबा मुफ्ती औरआगा रुहल्लाह मेहदी - फोटो : PTI
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विस्तार
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प्रदेश में नई सरकार आने के बाद चिट्ठियों का दौर तेज हो गया है। आगा रुहल्लाह मेहदी और महबूबा मुफ्ती ने सीएम उमर अब्दुल्ला को चिट्ठी लिखी। यासिन मलिक की पत्नी मुशाल हुसैन मलिक भी राहुल गांधी को पत्र लिख कर दबाव बनाने में जुट गईं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, ये सियासी समीकरण साधने की कोशिश ज्यादा नजर आती है।

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राज्य सभा में मनोनीत सदस्य गुलाम अली खटाना इन चिट्ठियों पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। उनका कहना है कि महज प्रचार और अपनी राजनीति चलाने को खतों को रोटेट किया जा रहा है। वे कहते हैं कि जरा ध्यान से पढें इनके शब्दों को, क्या जम्मू-कश्मीर की जनता के हित में कुछ है इनमें। चिट्ठियों से ये दिल नहीं जीत सकते हैं।आम लोगों का इससे कोई लेना देना नहीं है।

उमर सरकार के अपने सांसद रुहल्लाह ने पहली चिठ्ठी लिखी। उन्होंने मुख्यमंत्री को अपने वादों और प्राथमिकताओं की याद दिलाई। कुछ दिन बीते और एक पत्र फिर सुर्खियों में रसा। आतंकी फंडिंग मामले में जेल में बंद जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के चीफ यासीन मलिक की पत्नी मुशाल हुसैन मलिक ने जेल में बंद पति और लगे आरोपों को लेकर पत्र लिखा। ताजा पत्र पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती का है। उन्होंने पत्र लिख कर पिछले पांच साल में नौकरी से निकाले गए लोगों के मामलों की जांच के लिए एक कमेटी बनाने की मांग की है।
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गुलाम अली कहते हैं कि खत चाहे मेहदी का हो या महबूबा का, इसके पीछे इनका मकसद ठीक नहीं है। इन्हें आम आदमी से कोई लेना देना ही नहीं है। इन्हें जेड प्ल्स सुरक्षा चाहिए, बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ें। ये चाहते हैं कि गरीब का बच्चा पत्थर मारे, गरीब का बच्चा मरे। इन्हें बर्दाश्त नहीं हो रहा कि किसान खेत में जा रहा है, मजदूर काम करने जा रहा है। ये ठहराव वे देख नहीं पा रहे हैं। ये फैमिली वाले लोग चिट्ठियां रोटेट करते रहते हैं। इनका कोई अब अस्तित्व नहीं है।

पालीटिक्स आगे बढ़ा रहीं, ये मांगें तो सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहींवरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक संत कुमार शर्मा कहते हैं कि महबूबा मुफ्ती अपनी पाॅलीटिक्स को आगे बढ़ा रही हैं। जो मांग चिट्ठी में महबूबा ने की है, वो तो उमर अब्दुल्ला के अधिकार क्षेत्र में है ही नहीं। जनरल एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट तो मुख्यमंत्री के पास है ही नहीं।

महबूबा बताएं कि किसकी कमेटी की बात हो रही है, आईएएस शामिल नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वो कार्यक्षेत्र में ही नहीं। पुलिस हो या सीआईडी, कोई जवाबदेह है ही नहीं तो कमेटी बनाने से क्या होगा। यह जलेबी बनाई जा रही है। अपनी प्रोजेक्ट करने का तरीकाकश्मीर विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रो. नूर अहमद बाबा कहते हैं कि यासीन मलिक का मामला तो महज सुर्खियों में आने और मुद्दा उठाने का है। मुझे नहीं लगता कि राहुल गांधी इसे गंभीरता से लेकर कुछ करेंगे। इस तरह के पत्र सिर्फ अपनी इमेज को प्रोजेक्ट करने का है।

वे अपनी प्रांसगिकता को बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं। वे जानती हैं कि वे हार चुकी हैं। सदन में प्रस्ताव लाकर भी उन्होंने यही किया। वे मुद्दों को उठाकर ये भी बताने की कोशिश कर रही हैं कि उन्हें लोगों के मुद्दों की चिंता है, सरकार गंभीर नहीं है। मेहदी का अपनी अलग इमेज है। सरकार को पत्र लिखकर वो उसी को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। वे अपनी ही पार्टी को याद दिलाकर ये भी लोगों को बताना चाह रहे हैं कि वे आवाम के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझ रहे हैं।
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खतों के दबाव में कुछ बेहतर भी हुआ है 
खतों की सियासत के कुछ बेहतर नतीजे भी सामने आए हैं। प्रचार पाने की खत लिखने वाले राजनेता को इसका फायदा मिला या नहीं, इसे छोड़कर देखें तो कई फैसले जनमानस के हित में हो गए। जेकेएएस परीक्षा की आयु सीमा में तीन साल तक की छूट मिल गई। इसी के साथ जम्मू-कश्मीर पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा में आयु सीमा में छूट भी मिल गई। शीतजोन के लोगों को नवंबर-दिसंबर में परीक्षा देने का मौका मिल गया। लेक्चरर की भर्ती और डाक्टरों की नियुक्ति को भी सरकार की प्राथमिकता पूरी करने के दबाव के रूप में देखा जा रहा है।
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