जम्मू। उच्च न्यायालय ने सड़क एवं भवन निर्माण विभाग पर 10 लाख रुपये का विशेष हर्जाना लगाया है। विभाग ने एक व्यक्ति की जमीन पर जबरन पुल बना दिया। इसके लिए न तो उससे अनुमति ली और न सहमति। इसके बदले में उसे कोई मुआवजा तक नहीं दिया। अब न्यायालय ने इस पर संज्ञान लेते हुए विभाग को तीन महीनों के भीतर अपीलकर्ता को हर्जाने के तौर पर 10 लाख रुपये देने का आदेश दिया है। यदि ऐसा नहीं होता तो अपीलकर्ता दोबारा उच्च न्यायालय में याचिका दायर करेगा, जिस पर कड़ा संज्ञान लिया जाएगा। यह मामला बांदीपोरा का है। शब्बीर अहमद याटू की 9 मरले जमीन पर विभाग ने 2017 में एक पुल बना दिया। इसके लिए शब्बीर से कोई अनुमति नहीं ली गई।
वीरवार को मुख्य न्यायाधीश पंकज मित्थल और न्यायाधीश जावेद इकबाल वानी ने इस मामले से जुड़ी याचिका पर सुनवाई की। खंडपीठ ने कहा कि यह अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त है कि संपत्ति का अधिकार एक बुनियादी मानव अधिकार है जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 300 ए द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकार के समान है। निम्नलिखित प्रक्रिया के अलावा किसी को भी उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है। कानून में निर्धारित और इस मामले में वर्णित तथ्यों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता के मूल मानव अधिकार का उल्लंघन किया है और कानून की किसी भी प्रक्रिया का पालन किए बिना उसे उसकी संपत्ति से वंचित कर दिया है। यह भी कहा कि प्रतिवादी याचिकाकर्ता के मूल मानव अधिकार का उल्लंघन करने के लिए दंडित किए जाने के लिए उत्तरदायी है और साथ ही साथ उक्त भूमि के मुआवजे का भुगतान प्रचलित स्टाम्प शुल्क दर के साथ-साथ इसके उपयोग और कब्जे के लिए किराये के मुआवजे का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है। लिहाजा इसके लिए वर्ष 2017 से लेकर अब तक प्रतिवर्ष के हिसाब से जमीन इस्तेमाल करने के लिए प्रति वर्ष के हिसाब से एक लाख रुपये दे और 10 लाख रुपये का हर्जाना भी दे। यह सब तीन महीने में मिलना चाहिए।
गोवा भेजने के नाम पर ठगी के आरोपी को जमानत नहीं
जम्मू। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्यों को गोवा की ट्रिप के नाम पर लाखों रुपये का चूना लगाने वाले आरोपी की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया है। आरोपी रविंदर कुमार ने अन्य लोगों के साथ मिलकर 8 लाख रुपये की धोखाधड़ी की है। सिटी जज मंजीत राय ने वीरवार को आरोपी की जमानत अर्जी पर सुनवाई की। उन्होंने कहा कि अभी तक एकत्र किए गए सबूतों पर टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी क्योंकि मामले की जांच अपने शुरुआती चरण में है। आरोपी/आवेदक जमानत देने में किसी प्रकार की नरमी के पात्र नहीं हैं। यह भी आशंका है कि यदि आरोपी/आवेदक जमानत पर रिहा हो जाता है, तो वह अभियोजन पक्ष के गवाहों को जीतने और अभियोजन साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास करेगा। अभी तक सह आरोपी की भी गिरफ्तारी होनी बाकी है। लिहाजा उसे जमानत नहीं दी जा सकती।