मिनी कश्मीर में लड़ाई कठिन है। जितेंद्र सिंह को पीएम मोदी के नाम और कांग्रेस के लाल सिंह को सत्ता से नाराज वोटरों से उम्मीद है। गुलाम नबी की पार्टी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में हैं।
जम्मू में डोडा से कुछ किमी आगे मिनी कश्मीर कहे जाने वाले भद्रवाह में चुनावी रैली चल रही है। प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक आजाद पार्टी के नेता गुलाम नबी आजाद इस छोटे से कस्बे से अपने रिश्तों और कराए गए कामों के नाम पर अपने प्रत्याशी के लिए वोट मांग रहे हैं। छोटी सी सभा में हिंदू और मुसलमान दोनों हैं। आजाद दोनों से मजहबी नारों पर न बंटने की अपील करते हुए विकास के नाम पर वोट करने को कह रहे हैं।
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सियासी गुणा-गणित और तमाम वादों के बीच खास बात यह है कि उधमपुर लोकसभा क्षेत्र में विकास अहम मुद्दा है। भाजपा प्रत्याशी और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह को पीएम नरेंद्र मोदी के कराए कामों पर भरोसा है, तो कांग्रेस के प्रत्याशी लाल सिंह कहते हैं कि क्षेत्र के साथ कभी न्याय नहीं हुआ।
लाल सिंह कांग्रेस से दो बार सांसद रहने के बाद 2019 में टिकट न मिलने पर भाजपा में शामिल हुए थे। कठुआ प्रकरण में आरोपियों के समर्थन से चर्चा में आने पर उन्होंने भाजपा से इस्तीफा देकर अपनी पार्टी बनाई थी। अब कांग्रेस में शामिल होकर चुनावी मैदान में हैं। वह राज्य सरकार में मंत्री भी रहे।
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करीब 16.5 लाख मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में भाजपा ने प्रधानमंत्री कार्यालय से संबद्ध अपने मंत्री जितेंद्र सिंह को तीसरी बार उतारा है। भाजपा और कांग्रेस की लड़ाई त्रिकोणीय बनाने के लिए आजाद की पार्टी से पूर्व विधायक जीएम सरूरी मैदान में हैं।
जम्मू से कटड़ा निकलते हुए ही लोकसभा क्षेत्र आरंभ हो जाता है। रास्ते में चौक टिकरी पर चाय की दुकान पर चल रही बहस में सांसद से थोड़ी नाराजगी दिख रही थी, हालांकि यह बात भी हुई कि प्रत्याशी नहीं, पार्टी के नाम पर वोट दिया जाएगा।
चर्चा कर रहे लोग नाम बताना नहीं चाह रहे थे, लेकिन यह जरूर कहा कि कांग्रेस प्रत्याशी के मुकाबले भाजपा के सांसद लोगों के बीच में कम रहे। यह बात और है कि चर्चा का अंत केंद्र की सरकार की ओर से कराए गए कामों और विदेशों तक अच्छी छवि जैसी बातों से हुआ।
स्थानीय मुद्दों पर मुखर
इस संसदीय क्षेत्र का सबसे बड़ा और तुलनात्मक तौर पर विकसित शहर उधमपुर ही है। यह सेना का बड़ा केंद्र है। सेना से जुड़े परिवारों के कारण यहां के बाजार में रौनक भी रहती है। पीएम मोदी 12 अप्रैल को यहां आकर चुनावी पारा बढ़ा चुके हैं। यह इलाका भाजपा का मजबूत गढ़ है। खास बात यह है कि स्थानीय मुद्दे सांसदी के चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं।
देविका नदी छोटे से नाले के रूप में शहर के बीच बह रही है, पर इसे गंगा की बड़ी बहन माना जाता है। बैसाखी के दिन मेले में हजारों लोग आए थे। पास के गांव से आए बिजेंद्र सिंह कहते हैं, बदबूदार पानी के कारण इसमें कोई नहा भी नहीं सकता है। युवा रवि कहते हैं, गंदगी के कारण पानी छू भी नहीं सकते। यहां के लोग अस्थि विसर्जन हरिद्वार न जाकर देविका के किनारे ही करते हैं।
अनुच्छेद-370 को लेकर आमने-सामने
इस क्षेत्र में भाजपाई अनुच्छेद-370 खत्म करने को बड़ी उपलब्धि बताते हैं, तो स्थानीय लोगों में विशेष दर्जा छिनने की नाराजगी भी है। उन्हें लगता है कि नौकरियों व व्यापार पर भी बाहरियों का कब्जा हो जाएगा। कांग्रेस इसी को भुनाना चाहती है। शहर में घुसते ही चौक पर मिले धर्मेंद्र कहते हैं, डर तो है कि कहीं उनके संसाधनों पर बाहरी आकर कब्जा न कर लें। पहले मिलने वाली मुफ्त बिजली अब महंगी हो गई है। हालांकि यह भी कहते हैं कि केंद्र ने कुछ सोच समझकर ही किया होगा। हालांकि मुकाबला कड़ा होने की बात उनके साथ खड़े दो और लोग भी मानते हैं। पटनीटॉप के होटल व्यवसायी रोबिन भी मुकाबले को आसान नहीं मान रहे। कहते हैं कि इस बार कोई बड़ी लहर नहीं है। बटौत में कुछ चुनावी झंडे दिखाई दिए। यहां के लोगों का दर्द है कि कश्मीर से सुंदर होने के बावजूद पर्यटन के नक्शे पर उनका क्षेत्र नहीं आ सका।
लाभार्थियों का बड़ा वर्ग
यहां केंद्र की योजनाओं के लाभार्थियों का भी बड़ा वर्ग है। पटनीटॉप जाते हुए कुद गांव निवासी चंदर कहते हैं कि उन्हें घर मिला है। परिचितों को भी लाभ हुआ है। परचून दुकानदार अशोक कुमार कहते हैं, कृषक सम्मान निधि से बीज लेने में फायदा होता है। क्षेत्र में खुले नए मेडिकल कॉलेज के साथ 9 किमी लंबी चिनैनी-नाशरी टनल भी विकास के बड़े कामों में गिनी जाती है। हालांकि सांसद की ओर से गोद लिया गांव सद्दल दुखती रग है। लैंडस्लाइड से तबाह हुए इस गांव को राहत नहीं मिलने पर कांग्रेसी स्थानीय सांसद को घेर रहे हैं।
गुलाम नबी आजाद के असर की भी परीक्षा
जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम और पूर्व कांग्रेसी गुलाम नबी आजाद खुद की पार्टी बनाकर चुनावी मैदान में हैं। उधमपुर में जीएम सरूरी लड़ रहे हैं। आजाद को सीएम रहने के दौरान जम्मू में कराए गए कामों के लिए पसंद किया जाता है। हालांकि, इसी सीट से आजाद 2014 में जितेंद्र सिंह से हार गए थे। इस संसदीय सीट पर 30 से 35% तक मुस्लिम हैं। इनकी संख्या भी किश्तवाड़ और डोडा के आसपास ही ज्यादा है।
आजाद का दावा है कि उन्होंने कभी धर्म की राजनीति नहीं की। उनकी पार्टी के प्रत्याशी आसानी से जीत जाएंगे। भाजपाइयों को उम्मीद है कि यह वोट बैंक आजाद की पार्टी के खाते में जाने से उन्हें फायदा होगा। कांग्रेसियों का दावा है कि उन्हें नेशनल कॉन्फ्रेंस एवं पीडीपी का साथ होने के कारण किश्तवाड़, डोडा और उसके आसपास फायदा होगा।