जम्मू-कश्मीर अब इन बदले हुए रास्तों में तेजी से नए ठिकाने के रूप में उभरा है। यहां के छह जिलों में सात साल में 67 हजार से अधिक मवेशी तस्करों के चंगुल से छुड़ाए गए। 7,000 से ज्यादा वाहन पुलिस ने जब्त किए। प्रदेश में तस्करी का दायरा पहले सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित माना जाता था। अब कठुआ और सांबा से आगे बढ़कर उधमपुर व रामबन तक तस्करी का नेटवर्क है। डोडा व किश्तवाड़ जैसे पहाड़ी जिलों में भी तस्करी के मामले सामने आए हैं। यानी तस्करों ने पुलिस की निगरानी से बचने के लिए लंबा और घुमावदार रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है।
सीमावर्ती जिलों से पहाड़ों तक फैला नेटवर्क
तस्करी के बदले रूट की तस्वीर जम्मू-कश्मीर के छह जिलों के आंकड़ों से भी सामने आती है। 2019 से मार्च 2026 तक अकेले रामबन में 2,341 एफआईआर दर्ज हुईं और 31,798 मवेशी बचाए गए। इसी अवधि में उधमपुर में 1,545 एफआईआर और 14,636 मवेशी, कठुआ में 1,076 एफआईआर व 11,017 मवेशी तथा सांबा में 767 एफआईआर और 6,304 मवेशी बचाए गए। पहाड़ी जिलों में भी तस्करी की मौजूदगी दर्ज हुई है। डोडा में इस अवधि में 273 एफआईआर में 2,964 मवेशी बचाए गए, जबकि किश्तवाड़ में 136 एफआईआर के दौरान 1,081 मवेशियों को तस्करों के चंगुल से छुड़ाया गया। इन आंकड़ों को मिलाकर देखें तो छह जिलों में 2019 से मार्च 2026 तक 6,138 एफआईआर दर्ज हुईं और 67,800 मवेशी बचाए गए। इस दौरान 7,000 से अधिक वाहन भी जब्त किए गए। यह बताता है कि मामला केवल सीमा से लगे कुछ इलाकों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि तस्करी का नेटवर्क जम्मू संभाग के भीतर गहराई तक फैल चुका है।
टैंकर से लग्जरी कार तक बदले तस्करी के तरीके
तस्करों ने रास्ते ही नहीं, मवेशियों को छिपाकर ले जाने के तरीके भी बदले हैं। कभी तेल टैंकर में विशेष जगह बनाई जाती है तो कभी महंगी-लग्जरी गाड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है।ट्रकों में कबाड़ या अन्य सामान के बीच मवेशियों को छिपाकर ले जाने की कोशिश की गई है। इसे पुलिस ने भी रणनीति बदली। संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष नाके बनाए गए। वाहनों की जांच बढ़ाई। संदिग्ध वाहनों पर नजर रखी जा रही है। कार्रवाई का असर भी आंकड़ों में दिखता है। बड़ी संख्या में वाहन जब्त कर काफी संख्या में मवेशियों को बचाया गया है। तस्करी में शामिल लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं। इसके बावजूद कारोबार पूरी तरह थमा नहीं है।
एक रास्ते पर शिकंजा कसा तो दूसरे से शुरू कर दी घुसपैठ
एक रूट पर सख्ती बढ़ते ही तस्कर दूसरे रास्ते की तलाश शुरू कर देते हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में दबाव बढ़ने पर अब लंबा और पहाड़ी रास्ता अपनाने की कोशिशें सामने आ रही हैं। यही वजह है कि पुलिस के सामने अब चुनौती सिर्फ तस्करी के दौरान मवेशियों को छुड़ाने या वाहन जब्त करने तक सीमित नहीं है। असली चुनौती उस पूरे नेटवर्क तक पहुंचने की है, जो मवेशियों को जुटाने, उन्हें वाहनों में लोड करने, रास्ते में सुरक्षित निकालने व आगे पहुंचाने का काम करता है।