चिशोती नाले में न तो कोई ग्लेशियर टूटा और न ही कोई झील फटी। चिशोती से करीब एक किलोमीटर ऊपर 15 मिनट की तेज बारिश के साथ आए मलबे को 450 मीटर की खड़ी ढाल ने इतना जानलेवा बना दिया कि उसने पूरे गांव को तबाह कर दिया। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के उत्तरी क्षेत्र, लखनऊ स्थित ग्लेशियोलॉजी डिवीजन की टीम ने चिशोती का प्रारंभिक सर्वे कर यह आकलन तैयार किया है।
चिशोती में बीती 14 अगस्त को आई आपदा में 67 लोगों की जान चली गई थी, जबकि सवा सौ के करीब घायल हुए थे। जम्मू-कश्मीर में अब तक की सबसे बड़ी आपदा मानी जा रही इस घटना को शुरू में बादल फटने या ग्लेशियर से बनी झील के फटने से आई बाढ़ का नतीजा माना गया था लेकिन सर्वे ऑफ इंडिया की टीम ने फील्ड विजिट के दौरान मिले साक्ष्यों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और सेंटिनल-2ए इमेजरी के जरिए यह साफ किया है कि वह अत्यधिक वर्षा के साथ आए मलबे के प्रवाह का परिणाम था।
450 मीटर की एक खड़ी ढलान पर पत्थरों, बोल्डरों और चट्टानों आदि के मलबे के साथ आए पानी का वेग इतना प्रचंड हो गया कि वह अपने साथ कुछ मिनट के भीतर ही किसी को समझने का मौका दिए बगैर सब कुछ बहा ले गया। चिशोती नाले के किनारे बेतरतीब निर्माण की वजह से इसमें जान-माल की ज्यादा हानि हुई।
चिशोती गांव से करीब एक किलोमीटर ऊपर घटना से पहले और बाद की सेंटिनल इमेजरी घटना को और साफ करती है। इसमें चशोती ग्लेशियर के मेल्टिंग प्वाइंट के आसपास या उससे निकलने वाली धाराओं में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं दिखता। हालांकि, इस प्वाइंट के ठीक नीचे नाले में भू-आकृतिक बदलाव दर्ज किया गया। यह चौड़ा दिखाई दे रहा है। इससे यह अनुमान लगाया गया है कि उस वक्त तेज बारिश की वजह से आसपास स्थित छोटी-छोटी कई धाराएं सक्रिय हो गईं, जिन्होंने मलबे के बहाव के साथ मिलकर उसे और संवेदनशील बनाया।
बादल फटा या नहीं...जवाब अनुत्तरित
चिशोती के ऊपर बादल फटा या नहीं, इसका जवाब अभी अनुत्तरित है। मौके का दौरा करने वाली टीम में शामिल एक सीनियर जियोलॉजिस्ट के अनुसार चिशोती के करीब एक किलोमीटर ऊपर अत्यधिक वर्षा हुई, यह तय है लेकिन बादल फटने का एक मानक है। इसके लिए एक घंटे के भीतर एक नियत स्थल पर 100 मिलीमीटर से अधिक बारिश होना आवश्यक है। वहां बारिश का मापन न होने की वजह से इसे बादल फटना कहा जाना संभव नहीं।
दौरा करने वाली टीम में जियोलॉजिस्ट्स के साथ ही एनडीआरएफ, एसडीआरएफ के अधिकारी और प्रशासन के कुछ नुमाइंदे भी शामिल थे। इस टीम ने अपना प्रारंभिक आकलन स्थानीय प्रशासन के साथ भी साझा किया है। टीम में शामिल एक सीनियर जियोलॉजिस्ट के अनुसार इस घटना के मद्देनजर पर्वतीय आपदाओं के प्रति संवेदनशील हिमालयी गांवों में खतरे के विस्तृत आकलन की बहुत जरूरत है। अली वॉर्निंग सिस्टम विकसित किए जाने के साथ ही स्थानीय समुदायों को भी आपदा के प्रति तैयार रहने को जागरूक करना होगा।
कटड़ा का दौरा करने आज जाएगी वैज्ञानिकों की टीम
माता वैष्णो देवी मार्ग पर हुए भूस्खलन का जायजा लेने वैज्ञानिकों की टीम सोमवार को कटड़ा जाएगी। इसमें जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के साथ ही कई अन्य संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल होंगे। बीती 26 अगस्त को भूस्खलन में 34 श्रद्धालुओं की जान चली गई थी।