जम्मू-कश्मीर कला संस्कृति व भाषा अकादमी ने शुरू की गुरु-शिष्य योजना
विलुप्त हो रहीं गीतडू, छज्जा, हरण नृत्य, कश्मीरी सारंगी सहित 26 लोक कलाओं की हुई है पहचान
अरुण कुमार
जम्मू। जम्मू-कश्मीर में विलुप्त हो रही लोक कलाओं के संरक्षण का होगा। इसके के लिए जम्मू-कश्मीर संस्कृति विभाग ने गुरु- शिष्य परंपर शुरू की है। इसमें विलुप्त हो रही गीतडू, छज्जा, हरण नृत्य, कश्मीरी सारंगी सहित 26 अन्य लोक कलाओं की पहचान की हैं, जिनका संरक्षण पर काम किया जाएगा। इन कलाओं से अभी तक जुड़े कलाकार, नए पीढ़ी जोड़ेंगे, जिसके लिए गुरु, सहायक व शिष्य को वित्तीय मदद भी दी जाएगी।
जम्मू-कश्मीर अपनी समृद्ध संस्कृति और लोक विरासत के लिए जाना जाता है। यहां हर जिले में अलग-अलग भाषा, रीति रिवाज और लोक परंपराएं हैं, जो इस प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को दिखाता है। युवा पीढ़ी की लोक कलाओं से दूरी से इसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इसको कम करने के लिए गुरु-शिष्य परंपरा को शुरू किया जा रहा है।
इस पहल को सरकार की मंजूरी मिल चुकी है, वित्तीय विभाग से पैसा मंजूर होने के बाद पहल धरातल पर शुरू हो पाएगी। इसमें गुरु को 10 हजार रुपये हर महीने, सहायक को 7500 हर महीने और शिष्य को पांच हजार रुपये हर महीने आर्थिक मदद दी जाएगी। हर छह महीने इसका आकलन किया जाएगा। कल्चरल अकादमी प्रदेश में विलुप्त हो रही ऐसी 25 लोक कलाओं को पहचान की हैं, जिनको सहेजने पर काम होगा।
इन विलुप्त होती कलाओं की हुई है पहचान
इस योजना के तहत विभिन्न पारंपरिक कलाओं की पहचान की है। इसमें भखान, सुरनई, हेटे, भजन, धमाली नृत्य, कारकान, भांडपाथेर (लोक थिएटर), गीतडू (गायन और नृत्य), हरण नृत्य, दास्तानगोई, लाडीशाह, बच-ए-नगमा, रबाब, संतूर, कश्मीरी सारंगी, पहाड़ी बार, गोजरी बैथ, कश्मीरी सूफियाना, जोरी (जुड़वां बांसुरी), बसोहली पेंटिंग, मसाधे, छज्जा, सुगली, गुरी, सिराजी लोक नृत्य और लघु पेंटिंग शामिल हैं।
विलुप्त हो रही लोक कलाओं का संरक्षण किया जाएगा। हमने ऐसी लोक कलाओं की पहचान की। सरकार से योजना को मंजूरी मिल चूकी है। फंड मिलने के साथ ही इस योजना के साथ गुरु और शिष्य को जोड़ा जाएगा।
-हरविंदर कौर, सचिव, जम्मू-कश्मीर कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी