जम्मू-कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की सबसे बड़ी परीक्षा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से मुश्किलें और बढ़ गई हैं। अब तक पीडीपी ने विधानसभा चुनावों के लिए 31 निर्वाचन क्षेत्रों के प्रभारियों की घोषणा की है। इन घोषणाओं ने पार्टी में एक बड़ा विद्रोह पैदा कर दिया। कई प्रमुख नेताओं ने नाराज होकर पार्टी छोड़ चुके हैं।
नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के बीच गठबंधन के साथ ही पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के लिए चुनौती बढ़ गई है। नेकां-कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर में 90 विधानसभा क्षेत्रों में एक साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया है। पीडीपी घाटी में अकेले चुनाव लड़ रही है।
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घाटी में 47 सीटों पर नेकां-कांग्रेस गठबंधन पीडीपी, अपनी पार्टी, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, अवामी इत्तेहाद पार्टी और कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़ेगा। नेकां-कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे की व्यवस्था पर बातचीत के दौरान फारूक अब्दुल्ला व उमर पीडीपी से गठबंधन के सवालों को टाल दिया।
इससे संकेत मिलते हैं कि पीडीपी को शामिल करना महज अटकलें थीं। नेकां के एक नेता ने कहा कि पीडीपी ने लोकसभा चुनावों में हमारे दो उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़ा था, जिन्हें इंडिया गठबंधन के उम्मीदवारों के रूप में मैदान में उतारा गया था। हम विधानसभा चुनावों में गठबंधन के लिए उससे कैसे बात कर सकते थे।
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पीडीपी अपने गठन के बाद से 1999 में नेकां की मुख्य प्रतिद्वंद्वी थी और पिछले 25 वर्षों में नेकां को दो बार सत्ता से बाहर रखा। नेकां नेता ने कहा, हमें अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी को फिर से संगठित करने में मदद क्यों करनी चाहिए, जो 2019 के बाद अपना वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
केवल समान विचारधारा वाली पाटियों पर विचार
कांग्रेस के नवनियुक्त प्रदेशाध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने भी बातचीत में पीडीपी का जिक्र तक नहीं किया। उन्होंने केवल समान विचारधारा वाली पार्टियों के बारे में कहा। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, पीडीपी कभी भी लूप में नहीं थी और कुछ अफवाहें शुरू में फैलाई गईं, लेकिन जब नेकां-कांग्रेस ने खुले तौर पर गठबंधन की घोषणा की तो उन पर विराम लग गया। नेकां-कांग्रेस के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन इंडिया गठबंधन व्यवस्था के तहत हुआ है।
पीडीपी के कई प्रमुख चेहरों ने पार्टी से किया किनारा
अब तक पीडीपी ने विधानसभा चुनावों के लिए 31 निर्वाचन क्षेत्रों के प्रभारियों की घोषणा की है। इन घोषणाओं ने पार्टी में एक बड़ा विद्रोह पैदा कर दिया। कई प्रमुख नेताओं ने नाराज होकर पार्टी छोड़ चुके हैं। इनमें पूर्व विधायक एजाज मीर, डीडीसी सदस्य और प्रवक्ता डॉ. हरबख्श सिंह, पीडीपी के मुख्य प्रवक्ता सुहैल बुखारी शामिल हैं, जो वफादरों में जाने जाते थे। ये पांच अगस्त, 2019 के बाद महबूबा के साथ तब खड़े थे, जब 40 मुख्य नेताओं और सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोड़ कर अल्ताफ बुखारी के नेतृत्व में अपनी पार्टी का गठन किया था।
चुनाव से पहले पीडीपी में बगावत भूकंप जैसा
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 2014 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद भाजपा के साथ पीडीपी का गठबंधन और नेताओं-कार्यकर्ताओं की वफादारी को महत्व न देने से पीडीपी में नाराजगी का बड़ा कारण माना जा रहा है। 12-15 जीतने योग्य पूर्व विधायकों व नेताओं का छोड़ना और पार्टी का लोकसभा चुनाव हारना एक झटका है।
2014 के विधानसभा चुनावों में पीडीपी ने पुंछ और राजोरी से 28 सीटें जीती थीं और भाजपा के साथ सरकार बनाई थी। 2002 के चुनावों में पीडीपी ने 16 सीटें जीती थीं, लेकिन कांग्रेस के साथ गठबंधन का नेतृत्व किया था। इस चुनाव में पीडीपी की सबसे बड़ी परीक्षा है।
चुनौती
- गठबंधन के लिए किसी भी पार्टी का साथ नहीं मिलना
- 12 से 15 पूर्व विधायकों व नेताओं का पार्टी छोड़ना
- हाल के लोकसभा चुनाव में प्रदेश में एक भी सीट नहीं जीत पाना