दिलचस्प यह है कि कश्मीर केंद्रित पार्टियों में घमासान है। नेकां, पीडीपी, अपनी पार्टी और पीपुल्स कांफ्रेंस के बीच आरोप-प्रत्यारोप के साथ ही एक दूसरे पर निशाना साधा जा रहा है। अपनी पार्टी अध्यक्ष अल्ताफ बुखारी ने पीडीपी को भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी की जमात बताते हुए कहा कि पीडीपी जमीन पर कहीं भी नहीं है।
महबूबा लोगों की भावनाओं को भड़काकर सियासत करना चाहती हैं। मुठभेड़ों पर बयान देने की क्या जरूरत है। पीपुल्स कांफ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद गनी लोन ने नेकां को निशाने पर लेते हुए कहा है कि प्रदेश को सबसे ज्यादा नुकसान इसी पार्टी ने पहुंचाया। नेकां उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला लगातार कश्मीर के लोगों से झूठ बोल रहे हैं। वहीं, पीडीपी चुप्पी साधे हुए है। पार्टी की ओर से किसी भी दल के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा गया है।
हितों का संघर्ष शुरू, सत्ता के लिए हमले और हो सकते हैं तेज
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कश्मीर केंद्रित दलों में हितों का संघर्ष शुरू हो गया है। विधानसभा चुनाव सामने दिख रहा है। ऐसे में वह अपने को मजबूत करने के लिए दूसरे दलों पर हमले कर रहे हैं। इसमें गठबंधन सहयोगी का भी ख्याल नहीं रखा जा रहा है। केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू के डॉ. बच्चा बाबू कहते हैं कि गुपकार गठबंधन का गठन व्यापक परिप्रेक्ष्य में किया गया था।
मुख्य घटक दल नेकां, पीडीपी एवं पीपुल्स कांफ्रेंस थे, लेकिन पीपुल्स कांफ्रेंस ने डीडीसी चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर पहले ही बिदककर गठबंधन से नाता तोड़ लिया। अब नेकां एवं पीडीपी अपने-अपने आधार को मजबूत करने में अपने-अपने तरीके से जुटे हुए हैं। दरअसल उन्हें अपना भविष्य दिख रहा है। सत्ता के लिए सहयोगियों पर हमले होना लाजिमी है।