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कर्ज के दलदल में फंसता जा रहा जम्मू-कश्मीर

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कर्ज के दलदल में जम्मू-कश्मीर फंसता जा रहा है। रियासती सरकार का राजकोषिय दायित्व खतरे के निशान से ऊपर चला गया है। 31 मार्च, 2014 तक जम्मू-कश्मीर की देनदारियां 44,673 करोड़ रुपये पहुंच गई हैं, जो सरकार की टैक्स और नान टैक्स रेवेन्यू की कुल राशि का 4.88 गुणा है।
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यह खुलासा नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में हुआ है। कैग के अनुसार अपने व्यय फंड को पूरा करने के लिए राज्य सरकार की उच्च बाजार दरों वाले ऋण पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, जबकि सरकार को विकास फंड उत्पन्न करने के लिए स्वयं के राजस्व संसाधनों को बढ़ाना चाहिए।

वित्तीय वर्ष 2012-13 में सरकार की कुल देनदारियां 40,265 करोड़ रुपये थीं, जो 31 मार्च 2014 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में 44,673 करोड़ रुपये हो गईं। यानी एक साल में 4408 करोड़ का कर्ज बढ़ गया।
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बढ़ती जा रही है खाई

विधानसभा में पेश कैग की रिपोर्ट के अनुसार राजकोषीय ऋण की स्थिति पिछले साल के मुकाबले खराब थी और सरकार को इन्हें कम करने के प्रयास करने चाहिए थे।

राज्य के कर्ज पर चिंता जताते हुए कैग ने कहा कि वर्ष 2013-14 में संचित देनदारियां सरकार द्वारा इकट्ठा किए गए राजस्व से 1.68 गुणा ज्यादा थीं, जबकि सरकार के स्वयं के ‘कर’ और ‘गैर कर’ राजस्व से 4.88 गुणा ज्यादा रही।

कैग ने जोर देते हुए कहा कि राज्य की कर्ज स्थिरता निराशाजनक रही और संसाधन की खाई भी बढ़ती गई। लोन पर सरकार द्वारा दिया गया कर्ज 234 करोड़ से बढ़कर 1,289 करोड़ रुपये हो गई।

इतना ही नहीं, 2009-10 से 2013-14 तक विकास पूंजीगत व्यय में लगातार घटती प्रवृत्ति दर्ज की गई, जो यह दर्शाता है कि विकास कार्य अपर्याप्त संसाधनों से हो रहे थे।
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