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India Pakistan Tension: धमाकों की आवाज से रात उनींदे कटी... सुबह प्रवासी मजदूर घरों की ओर लौटने लगे

Sat, 10 May 2025 04:56 PM IST
शाहरुख खान प्रीत चौधरी, सांबा से
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प्रवासी मजदूर घरों की ओर लौटने लगे - फोटो : संवाद
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धमाकों के बीच सांबा में लोगों की रात उनींदे ही कटी। खामोशी की चादर में लिपटा रहा पूरा इलाका सुबह चल पड़ा। रोजी-रोटी की तलाश में आए प्रवासी श्रमिकों में अलबत्ता डर और अनिश्चितता का भाव दिखा। कारखानों में काम करने वाले प्रवासी श्रमिक सुबह ही अपने प्रदेशों की ओर लौटते दिखे। 
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ये श्रमिक पंजाब की ओर जाने वाली यात्री बसों में बैठने के लिए मुख्य चौक पर इकट्ठा हुए। मुख्य चौक पर मिले कानपुर के सतीश कुमार, कन्नौज के प्रदीप कुमार, पंकज, और हरदोई के कृष्ण कुमार ने बताया कि वे काफी समय से सांबा में निजी कारखाने में काम कर रहे हैं। 

यहां उनका परिवार भी साथ है। वे कहते हैं, ऐसी गोलाबारी हमने पहले कभी नहीं देखी थी। धमाकों की आवाज से रात बड़ी मुश्किल से गुजरी। अभी माहौल खराब है, ऐसे में अपने गांव जा रहे हैं। सुरक्षित स्थानों पर रुके लोग सांबा के रहने वाले लोग अपने परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर ले गए हैं। 
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स्थानीय निवासी कमल भट्टी बताते हैं, हम परिवार को पहाड़ी क्षेत्र छोड़ने जा रहे हैं। सीमावर्ती क्षेत्र मावा की पूर्व सरपंच अनीता देवी ने बताया, परिवार को पहले ही भेज दिया था। अब सोच रही हूं कि जिनके पास बंकर है, वहीं रहें, अन्य सुरक्षित स्थानों पर चले जाएं। 

सूरज की पहली किरण बंकर पर पड़े तो सबकुछ मंगल हो
हीरानगर से अरुण खजूरिया

सूरज की पहली किरण बंकर पर पड़े तो सब कुछ मंगल हो... यह शब्द सीमावर्ती लोगों के जज्बे को दर्शाते हैं, जिन्होंने वीरवार रात पाकिस्तान की गोलाबारी के बीच बंकरों में बैठकर गुजारी। दशकों से ये लोग पाकिस्तान की गोलाबारी का दंश झेल झेलते आए हैं।

सीमावर्ती गांवों के लोग ब्लैकआउट के चलते बंकरों में भीषण गर्मी के बावजूद हवा की सुविधा न होने के बावजूद भी यह लोग यहां डटे रहे, लेकिन प्रशासन की ओर से बनाए गए विस्थापित शिविरों में नहीं गए। करीब 50 से 60 लोगों ने ही इन शिविरों में रात गुजारी और सुबह फिर गांव लौट गए।

 

बंकरों में रात गुजरने वाले लोगों ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि रात बेहद डरावनी थी, लेकिन परिवार के सदस्य आपस में एक दूसरे का हौसला बढ़ाते रहे और यही दुआ करते रहे कि सुबह सूरज की पहली किरण जब उनके बंकर के भीतर पड़े तो सब कुशल मंगल हो। 

 
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इसी हौसले के साथ लगातार सीमावर्ती लोग अपने गांवों में डटे हुए हैं और उनका कहना है कि जब तक सांस है, वह अपने गांव में ही रहेंगे। गांव और घर छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे।

हालांकि प्रशासनिक अधिकारी लगातार इन लोगों से विस्थापित शिविरों में जाने की अपील कर रहे हैं और जो लोग गांव में ठहर रहे हैं उनसे भी संपर्क बनाए हुए हैं।
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