इसके बाद दोनों पक्षों में समझौता हो गया। शिकायतकर्ता ने भी लिखित रूप से सभी कानूनी कार्यवाही वापस लेने की बात कही, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने बाद में एफआईआर दर्ज की और शिकायतकर्ता ने फिर से आरोप लगाए कि समझौता धोखे से कराया गया था। इसके बाद दूसरे पक्ष ने एफआईआर को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की।
मामले में फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी साबित करने के लिए यह ज़रूरी है कि शुरू से ही बेईमानी की नीयत हो। मामले में आरोपियों ने पहले ही बड़ी रकम लौटा दी थी, जिससे यह संकेत मिलता है कि उनकी मंशा शुरुआत से ही गलत नहीं थी। कोर्ट ने माना कि शिकायतकर्ता का बाद में समझौते से पलटना और फिर से केस दर्ज करवाना सिर्फ बकाया राशि की वसूलने का तरीका था। इसी के साथ कोर्ट ने एफआईआर को रद्द कर दिया।