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शोध और शिक्षा से संरक्षित की जाए आदिवासी विरासत : जावेद राणा

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जम्मू। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) में आदिवासी विरासत मानचित्रण विषय पर मंगलवार को शैक्षणिक कार्यशाला हुई। इस दौरान आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति और परंपराओं के दस्तावेजीकरण को शिक्षा और शोध से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया।
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मुख्य अतिथि के रूप में आदिवासी मामलों के मंत्री जावेद अहमद राणा ने कहा कि आदिवासी विरासत जीवंत ज्ञान परंपरा है, जिसे शिक्षण संस्थानों के माध्यम से संरक्षित किया जाना चाहिए। समाज से जुड़ा ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह भाषा, विश्वास और सामाजिक जीवन में रचा-बसा है। इसे सहेजने के लिए समुदाय आधारित और सहभागी शोध मॉडल अपनाना जरूरी है। मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग के प्रमुख अमिताश ओझा ने कहा कि स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों का संरक्षण शिक्षण संस्थानों की सामूहिक जिम्मेदारी है। योजना और प्रबंधन विभाग के डीन अनुराग मिश्रा ने कहा कि संस्थान समुदाय केंद्रित शोध के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है। कला केंद्र के सचिव जाविद राही ने कहा कि आदिवासी समुदायों की अपनी भाषा में शोध करने से शिक्षा अधिक समावेशी और प्रामाणिक बनती है। उन्होंने पुंछ, बंदीपोरा और कुपवाड़ा जैसे क्षेत्रों में आदिवासी शिल्प और महिला कारीगरों के कार्य को शोध का हिस्सा बनाने पर जोर दिया। कार्यशाला में संस्थान के शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी शामिल हुए।

आदिवासी जीवन पर आधारित वृत्तचित्र का विमोचन

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की ओर से आदिवासी ज्ञान के दस्तावेजीकरण के लिए डिजिटल मंच शुरू किया गया। आदिवासी समुदाय से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज, चित्र, दृश्य सामग्री और शोध कार्य उपलब्ध कराए जाएंगे। यह मंच विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों के लिए स्थायी शैक्षणिक संसाधन के रूप में उपयोगी होगा। इस दौरान जुबान-ए-कलाम नामक वृत्तचित्र का विमोचन भी किया गया। प्रोफेसर कुलीन कौर ने बताया कि पिछले दो वर्षों में शोध दल ने आदिवासी समुदायों के पलायन, लोकगीत, मौखिक परंपराओं, विवाह और अंतिम संस्कार से जुड़ी रीतियों को दर्ज किया है।
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