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हिंदी हैं हम: शिक्षाविद-साहित्यकार बोले- हिंदी को रोजगार की भाषा बनाए सरकार

Wed, 14 Sep 2022 03:19 PM IST
kumar गुलशन कुमार अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

प्रदेश के लिए हिंदी मन की भाषा है। यहां सांस्कृतिक विविधता के चलते हिंदी भाषा सभी को एक सूत्र में पिरोने का काम कर रही है। हिंदी का अधिक प्रचार प्रसार होने के साथ पर्यटन को भी बढ़ावा मिल रहा है।
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हिंदी दिवस 2022 - फोटो : निखिल मेहता
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विस्तार
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आज देशभर में हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। इस मौके पर यूनिक पब्लिक सीनियर सेकेंडरी गाडीगढ़ के बच्चों ने हिंदी शब्द के आकार में खड़े होकर राष्ट्र भाष को सम्मान दिया। छोटी उम्र में बच्चों का यह अनूठा प्रयास यकीनन एक दिन एक-दूसरे को जोड़ने का बड़ा माध्यम बनेगा।
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केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू-कश्मीर में हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिले 2 साल हो गए हैं, लेकिन सरकारी कार्यालयों में अभी भी हिंदी को जमीनी स्तर पर लागू नहीं किया जा रहा। अभी भी कार्यालयों में हिंदी में कामकाज शुरू नहीं हो पाया है। ज्यादातर काम इंग्लिश और उर्दू में हो रहा है। हिंदी को रोजगार की भाषा बनाने के प्रयास नहीं हो रहे हैं। 

अदालतों, पुलिस और राजस्व विभाग में काम के लिए जाने वाले लोगों को भाषा संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। पुलिस थानों में उर्दू और इंग्लिश में प्राथमिकी दर्ज की जा रही है। इसके लिए शिकायतकर्ताओं को उर्दू के जानकारों का सहारा लेना पड़ रहा है। अदालतों और राजस्व विभाग में भी उर्दू और इंग्लिश में कामकाज चल रहा है। 
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प्रदेश के शिक्षाविदों और साहित्यकारों का कहना है कि स्कूलों व कॉलेजों में हिंदी के शिक्षकों के रिक्त पदों को भी नहीं भरा जा रहा है। दर्जनों युवा एमफिल, पीएचडी, नेट व जेआरएफ की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं। कई युवा अनुबंधित आधार पर कॉलेजों में सेवाएं दे रहे हैं। उनका कहना है कि प्रदेश में लंबे समय से हिंदी पढ़ाई जा रही है। श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय कटड़ा में इस बार हिंदी विभाग खोला गया है। बाबा गुलाम शाह बादशाह विश्वविद्यालय में भी हिंदी विभाग खोलने की तैयारी है। इसके अलावा जम्मू विश्वविद्यालय में करीब 40 वर्षों से हिंदी विभाग में पीजी व शोधकार्य चल रहा है।

इस विवि के अधीन 150 से अधिक कॉलेजों, क्लस्टर विवि के पांच कॉलेजों में भी स्नातक में हिंदी विषय पढ़ाया जा रहा है। केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू में 2015 में हिंदी विभाग की स्थापना की गई थी। तब से लेकर हिंदी में स्नातकोत्तर कार्यक्रम जारी है। 2018 से शोधकार्य भी जारी है। इसके अलावा आईआईटी, आईआईएम, आईआईआईएम में भी हिंदी में कामकाज हो रहा है। स्कूलों में छात्रों का भी हिंदी की तरफ अच्छा रुझान है, लेकिन हिंदी क्षेत्र में रोजगार की कमी है। सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए।
 
इस बार एसएमवीडीयू कटड़ा में हिंदी विभाग खोलना गर्व और सम्मान की बात है। बाबा गुलाम शाह विवि में विभाग खोलने की संभावना है। अन्य संस्थानों में भी हिंदी भाषा में पढ़ाई जारी है, लेकिन युवाओं को हिंदी के क्षेत्र में रोजगार नहीं मिल पा रहा है। संस्थानों में पद रिक्त हैं, लेकिन इन्हें भरा नहीं जा रहा, जबकि अन्य विषयों के पदों पर भर्ती जारी है। अदालतों, पुलिस और राजस्व विभागों में भी काम के लिए जाने वाले लोग भाषा संबंधी दिक्कतों से जूझ रहे हैं। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से अपील है कि सरकारी कार्यालयों में हिंदी को कामकाजी भाषा के तौर पर लागू किया जाए। -प्रो. परमेश्वरी शर्मा, पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग जम्मू विश्वविद्यालय।

प्रदेश के लिए हिंदी मन की भाषा है। यहां सांस्कृतिक विविधता के चलते हिंदी भाषा सभी को एक सूत्र में पिरोने का काम कर रही है। हिंदी का अधिक प्रचार प्रसार होने के साथ पर्यटन को भी बढ़ावा मिल रहा है। पहले के बजाय संस्थानों में भी छात्र हिंदी पढ़ने में ज्यादा रुझान दिखा रहे हैं। नई शिक्षा नीति लागू होने से हिंदी के जमीनी स्तर पर लागू होने की संभावना बढ़ी है। हालांकि हिंदी पढ़ने और लिखने वालों को प्रदेश में रोजगार नहीं मिल पा रहा है। इस विषय के पद सृजित करने की जरूरत है। -प्रो. नीलम सराफ, हिंदी विभाग जम्मू विवि।

हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है। अन्य कई भारतीय भाषाओं के शब्दों को हिंदी अपने आंचल में समेटे हुए है। साहित्य लेखन में भी हिंदी का अधिक इस्तेमाल हो रहा है। अनुवाद व पत्रकारिता में हिंदी भाषा का पर्याप्त प्रचार प्रसार हो रहा है, लेकिन प्रदेश में हिंदी के क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा देने पर सरकार को ध्यान देना होगा। अधिक संख्या में युवा इस विषय की डिग्री पास कर भर्ती के इंतजार में बैठे हैं। -डॉ. भगवती वर्मा हिंदी प्राध्यापक महिला कॉलेज गांधी नगर ।

 केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू-कश्मीर में पहले के बजाय हिंदी का महत्व अधिक बढ़ गया है। कई परिवारों में बच्चों को भी हिंदी में ही शिक्षा दी जा रही है। जम्मू के कई दुकानदार अपनी दुकानों के बाहर बोर्ड पर अंग्रेजी में नाम लिखवाते हैं। जब अन्य प्रदेशों व राज्यों से दर्शनार्थी यहां आते हैं तो उन्हें अंग्रेजी पढ़ने में दिक्कत आती है। इसलिए दुकानदारों को भी चाहिए कि बोर्ड पर हिंदी भाषा का इस्तेमाल करें, ताकि आम लोगों को पढ़ने में आसानी हो। -डॉ. संजय मिश्र, हिंदी प्राध्यापक, संस्कृत विश्वविद्यालय जम्मू ।

अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में हिंदी को बढ़ावा मिला है। सोशल मीडिया पर हिंदी का ज्यादा प्रचार प्रसार हो रहा है। हिंदी के लेखकों व कवियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। उच्च शिक्षण संस्थानों में युवा हिंदी पढ़ने में रुचि दिखा रहे हैं। आने वाले समय में युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। सरकार को भी चाहिए कि हिंदी को सभी कार्यालयों में जमीनी स्तर पर लागू किया जाए। -अमिता मेहता, हिंदी साहित्यकार जम्मू।
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जम्मू-कश्मीर में हिंदी को अनिवार्य बनाने की आवश्यकता- पद्मश्री प्रो. शिव निर्मोही

जम्मू कश्मीर के प्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री प्रो. शिव निर्मोही ने सरकार से जम्मू कश्मीर में हिंदी भाषा को प्रोत्साहन देने के लिए इसे देश के अन्य राज्यों की तरह यहां भी अनिवार्य करने पर जोर दिया है। पूरे देश में तमिलनाडु के बाद जम्मू कश्मीर ही ऐसा राज्य है, जहां हिंदी अनिवार्य नहीं है। इसके कारण जम्मू कश्मीर में एक प्रतिष्ठित भाषा होने के बावजूद हिंदी के प्रोत्साहन में कमी नजर आती है।

प्रो. निर्मोही ने बताया कि 18वीं शताब्दी में जम्मू के राजा रणजीत देव के राजकर्मी कवि दत्तू पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने बृज भाषा में दत्त ग्रंथावली नामक एक ग्रंथ लिखा था। उसकी भाषा हिंदी थी। 18वीं शताब्दी से ही हमें जम्मू कश्मीर के इतिहास में हिंदी के कवि व लेखक मिल जाते हैं, जिन्होंने अपने कव्यों व साहित्य से हिंदी की सेवा की। तब से यह सिलसिला निरंतर चल रहा है। कवि दत्तू के वंशज भी डोगरी के साथ हिंदी में भी साहित्य लिखते रहे। इसी क्रम में महाराजा रणवीर सिंह के समय में हिंदी का काफी विकास हुआ और महाराजा हरि सिंह के समय में हिंदी भाषा में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन व प्रचलन भी होने लगा था।

उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर में हिंदी भाषा की स्थिति पर नजर डालें तो 1947 से पहले भी हिंदी भाषा यहां काफी प्रतिष्ठित हो चुकी थी। पढ़ने, लिखने तथा काफी कार्यालयों में कार्य हिंदी में होते थे। 1947 के बाद भी जम्मू प्रांत के साथ कश्मीर संभाग में भी बहुत से लेखक मिलते हैं, जिन्होंने हिंदी साहित्य के लेखन में विशेष योगदान दिया। वर्तमान में जम्मू प्रांत के सभी स्कूलों व कॉलेजों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। 

बहुत से लेखक, कवि व कहानीकार हिंदी के प्रोत्साहन के लिए विशेष प्रयास कर रहें हैं और बहुत सी ऐसी संस्थाएं हैं जो हिंदी के लिए समर्पित हैं और इसके प्रोत्साहन के लिए काम कर रही हैं। इसके बावजूद अभी तक जम्मू कश्मीर में हिंदी को अनिवार्य नहीं बनाया गया है। इसलिए, उनका मानना है कि देश के अन्य राज्यों की तरह जम्मू कश्मीर में भी हिंदी को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, और हिंदी में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं का आयोजन करवाया जाना चाहिए।

पहले से अब हिंदी की स्थिति जम्मू-कश्मीर में बेहतर हो गई है। प्रशासनिक शब्दावली मजबूत होने के साथ-साथ विज्ञापन भी हिंदी भाषा में आ रहे हैं। समाचार पत्रों का हिंदी भाषा को बेहतर करने में अधिक योगदान है। हिंदी साहित्य के साथ लोक साहित्य को भी बढ़ावा देने की जरूरत है। हिंदी ऐसी भाषा है, जो लोगों को आपस में जोड़ने का काम करती है। -परमेल कुमार, प्रोफेसर सांख्यिकी विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय।
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