हिमालयी क्षेत्र में सभी छोटे और बड़े ग्लेशियरों की कुल संख्या 9445 है
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हिमालय पर्वत श्रंखला के कराकोरम और उसके आसपास के बड़े इलाके के सभी ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिंग से बेअसर हैं। उनकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है और वे पूरी तरह स्थिर हैं। यह जानकारी जम्मू यूनिवर्सिटी में जियोलोजी विभाग के प्रोफेसर आर के गंजू ने अपने अध्ययन के बाद दी है।
प्रोफेसर गंजू ने बताया कि इस इलाके के हिमालयी क्षेत्र में सभी छोटे और बड़े ग्लेशियरों की कुल संख्या 9445 है। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन ग्लोशियरों के बारे में दो तरह की बातें लगातार कही जा रहीं हैं। कुछ का कहना है कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं, वहीं कुछ का कहना है कि ग्लेशियर स्थिर हैं, जबकि सच यही है कि ग्लेशियर स्थिर हैं।
उन्होंने कहा कि हो सकता है कि धरती के तापमान में कुछ वृद्धि हुई हो, लेकिन, भारतीय क्षेत्र में पड़ने वाले सभी ग्लेशियर इससे अप्रभावित हैं। उन्होंने बताया कि मौसम परिवर्तन प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसे रोका नहीं जा सकता। जब धरती पर मनुष्य नहीं था तब भी मौसम परिवर्तन होता रहा है।
पृथ्वी तीन बार ‘आइस बाल’ बन चुकी है
अपने अब तक के पूरे जीवन काल में पृथ्वी तीन बार ‘आइस बाल’ बन चुकी है। मनुष्य कुछ उपायों के जरिए इस प्रक्रिया को धीमा कर सकता है या तेज कर सकता है। इसलिए मौसम के साथ यह प्रभावित होते रहेंगे। ग्लेशियर का अपना चक्र होता है।
एक लाख साल का ग्लेशियल चक्र होता है। इसमें भी इंटर ग्लेशियर एज होती है। सबसे छोटा चक्र करीब 30 साल का होता है। इन स्थितियों में ग्लेशियरों की स्थिति प्रभावित होती रहती है। अभी सर्दियों का समय बढ़ गया है। मार्च में भी हिमालय के ऊपरी इलाकों में बर्फबारी होने लगी है। आने वाले दिनों में सर्दियों का समय बढ़ेगा और यह स्थिति ग्लेशियरों के लिए आदर्श स्थिति होगी।
प्रोफेसर गंजू ने बताया कि स्थानीय कारणों से कश्मीर के थाजमास, कोल्हाई और शेषनाग के ग्लेशियर कुछ-कुछ सिकुड़ रहे हैं। इसकी वजह विकास के लिए जंगलों की कटाई और पर्यटकों की बढ़ती संख्या है। मनुष्य के शरीर का तापमान 98 डिग्री सेल्सियस होता है। ऐसे में जब लाखों लोग किसी बर्फीली जगह पर जुटेंगे तो वहां के तापमान में थोड़ी वृद्धि होनी है।
जुरासिक काल में ध्रुवों पर नहीं थी बर्फ
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पृथ्वी के वातावरण में लगातार कार्बन की मात्रा बढ़ने से मौसम ग्लोबल वार्मिंग की ओर बढ़ सकता है। वातावरण में प्रति 10 लाख कणों में इसकी मात्रा 200 से अधिक नहीं होनी चाहिए।
मोनालुआ के अमेरिका के प्रशांत महासागर में स्थापित आबजरवेट्री की रिपोर्ट के मुताबिक अभी पृथ्वी के वातावरण में प्रति 10 लाख कणों में कार्बन की मात्रा 427 कण है। जुरासिक काल 20.5 करोड़ से 14.5 करोड़ साल पहले पृथ्वी के दोनों ध्रुवों पर बर्फ नहीं थी। उस समय समुद्र का जल स्तर आज की तुलना में 90 मीटर ऊपर था।
पिछले कुछ वर्षों में कार्बन की स्थिति
औद्योगिक क्रांति के पहले - 278 पीपीएम
सन 1800 में - 280 पीपीएम
सन 1960 में - 300 पीपीएम
सन 1970 में - 320 पीपीएम
सन 1980 में- 336 पीपीएम
(पीपीएम- पार्टिकल प्रति मीलियन)