पंचों के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने कई दिशा-निर्देश जारी किए। चीफ जस्टिस एनपाल वसंथाकुमार, जस्टिस याकूब मीर और जस्टिस बीएस वालिया की फुल बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि अदालत कानून के परिभाषित रूप में आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल द्वारा धारा 11 या अधिनियम की धारा 17 के तहत पारित आदेश में दायर आवेदन को हटा नहीं सकता है।
इसलिए संबंधित अथारिटी के समक्ष साथ की कार्यवाही नहीं रखी जा सकती, क्योंकि उसे अधिनियम की धारा 42 के तहत बाहर रखा गया है। सरल रूप से यह कहा जा सकता है कि (ए) यदि जिला कोर्ट के समक्ष अधिनियम की धारा 9 के तहत आवेदन किया गया हो और उस पर कोई आदेश पारित कर दिया जाए। ऐसे में पंचाट की कार्यवाही के दौरान रखे आवेदनों को अधिनियम की धारा 42 के तहत उसी कोर्ट में रखा जाए, किसी अन्य कोर्ट में नहीं।
(बी) इसी तरह यदि हाईकोर्ट ने कोई आदेश पारित किया हो तो सभी मामले हाईकोर्ट में ही रखे जाएं। पूर्ण पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि जेएंडके का हाईकोर्ट सिविल मूल क्षेत्राधिकार है और जिलों में जिला कोर्ट मूल क्षेत्राधिकार का प्रिंसिपल सिविल कोर्ट है। इसलिए दोनों कोर्ट अधिनियम की धारा 2(1) (ई) के तहत आते हैं। जब पंचाट के खिलाफ और शिकायतों पर दोनों पक्ष अधिनियम की धारा 34 के तहत एक ही तिथि पर जिला कोर्ट और हाई कोर्ट में आवेदन करते हैं तो मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय द्वारा की जाएगी।
जेएनएफ