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डीडीसी चुनाव: मोदी सरकार की गुगली, गुपकार गठबंधन के लिए खड़ी कीं मुश्किलें

Thu, 05 Nov 2020 02:54 AM IST
दुष्यंत शर्मा बृजेश कुमार सिंह, जम्मू

सार

  • चुनाव लड़े तो आंदोलन खत्म, नहीं लड़े तो जम्हूरियत पर विश्वास न करने का लगेगा ठप्पा
  • अनुच्छेद 370 के खिलाफ कश्मीर आधारित पार्टियों की लामबंदी तोड़ने की भी है कोशिश
  • नए जम्मू-कश्मीर में पहले डीडीसी चुनाव से राज्य की राजनीति को मिलेगा बूस्टर डोज
  • पार्टी आधार पर चुनाव कराकर जम्मू-कश्मीर को भगवा रंग में रंगने की तैयारी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : ANI
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विस्तार
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नए जम्मू-कश्मीर में पार्टी आधार पर पहले डीडीसी चुनाव की घोषणा कर मोदी सरकारने गुगली फेंकते हुए अनुच्छेद 370 हटने का विरोध करने के लिए एकजुट गुपकार गठबंधन के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। गठबंधन में शामिल नेकां, पीडीपी, पीपुल्स कांफ्रेंस, सीपीआई (एम) समेत अन्य दलों के लिए दुविधा खड़ी हो गई है कि यदि वे चुनाव नहीं लड़ते हैं तो जम्हूरियत में विश्वास न करने का ठप्पा लगेगा और अवाम के बीच वे बेनकाब हो जाएंगे।

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चुनाव लड़ने के इच्छुक कार्यकर्ताओं को संभालना भी मुश्किल हो जाएगा। यदि चुनाव लड़ते हैं तो उनका आंदोलन खत्म हो सकता है। ऐसे में अब देखना यह है कि वे इसकी काट का क्या रास्ता निकालते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव की घोषणा कश्मीरी नेताओं की एकजुटता को भी तोड़ने की कोशिश है, जिससे नए भूमि कानून, अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए लामबंद हो रहीकश्मीर आधारित पार्टियों एक मंच पर आने से रोका जा सके।

डीडीसी चुनाव पार्टी आधार पर कराकर पूरे जम्मू-कश्मीर को भगवा रंग में रंगने की भी तैयारी है। साथ ही विधानसभा चुनाव से पहले इसे सेमीफाइनल के रूप में मानते हुए अधिकाधिक सीट पर कब्जे की रणनीति के तहत भी काम हो रहा है। पंचायत व निकाय उप चुनाव की घोषणा से सरकार ने राज्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू कर दी है।
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यह प्रक्रिया अनुच्छेद 370 हटने के बाद से पिछले एक साल से बिल्कुल बंद पड़ी थी। राज्य के बाहरी लोगों को भी चुनाव लड़ने और वोट का अधिकार देकर मोदी सरकार ने दूर की चाल चली है। यह संदेश देने की कोशिश की है कि 370 हटने के बाद से अब देश में एक विधान और एक प्रधान का फार्मूला पूरी तरह लागू हो गया है। 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले एक साल से अधिक समय से जम्मू-कश्मीर में जो सबसे बड़ी कमी झलक रही थी वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया तथा राजनीतिक शून्यता। लोगों का जम्हूरियत से विश्वास डगमगाने लगा था। हालांकि, सरकार ने सभी राजनीतिक नेताओं को रिहा कर  श्मीर में राजनीतिक प्रक्रिया की बहाली की पहल की थी, लेकिन विश्लेषक कहते हैं कि यह जम्मू-कश्मीर की राजनीति को बूस्टर डोज देगा।

बाहरी लोगों के चुनाव लड़ने का हो सकता है विरोध
बाहरी लोगों के चुनाव लड़ने तथा वोट डालने का विरोध भी हो सकता है। कहा जा रहा है कि इसे जम्मू-कश्मीर के लोग अपने हक पर डाका मानकर विरोध कर सकते हैं। यह अलग बात है कि वे चुनाव में जीत हासिल न कर पाएं।

सरकार ने पार्टी आधार पर डीडीसी चुनाव कराकर कई को बेनकाब करने की चाल चली है। खासकर गुपकार गठबंधन के लिए। यह देखना होगा कि वे इस चुनाव को लेकर क्या स्टैंड लेते हैं। डीडीसी के गठन से विधायकों तथा मंत्रियों के अधिकार भी सीमित होंगे। अब संबंधित जिले की योजना तथा बजट बनाने का अधिकार डीडीसी के पास होगा। साथ ही यह शिकायत भी दूर हो जाएगी कि अमुक जिले के साथ बजट बनाने में भेदभाव किया जा रहा है। 
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-प्रो. हरिओम, राजनीतिक विश्लेषक

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