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इस देवी के आशीर्वाद से कर्नल ने जीता था जंस्कार

Thu, 17 Jul 2014 04:48 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, जम्मू
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जम्मू और कश्मीर में वैसे तो कई मंदिरो की अपनी एक से बढ़कर एक गाथा है। लेकिन माता मचैल मंदिर का अपना एक विशेष स्थान है। मचैल गांव किश्तवाड़ से 95 व गुलाबगढ़ से तीस किलोमीटर दूरी पर भूर्ज और भोट नाले के बीच में स्थित अत्यंत खूबसूरत गांव है। माता मचैल मंदिर की प्रसिद्धी पूरे देश में है। यहां तक कहा जाता है कि प्राचीन काल में योद्धा इस मंदिर में पहुंचकर माता की पूजा अर्चना करते थे।
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दुर्गम पहाड़ियों के बीच प्रकृति की गोद में बसे इस गांव के बीचोंबीच में प्रसिद्ध मचैल माता का लकड़ी मंदिर का बना हुआ है।  मंदिर के बाहरी भाग में पौराणिक देवी देवताओं की लकड़ी की बनी हुई कई पटिकाओं बनी हुई हैं। मंदिर के भीतर गर्भग्रह में मां चंडी एक पिंडी के रूप में विराजमान हैं। इस पिंडी के साथ ही दो मूर्तियां स्थापित की गई हैं, जिनमें एक मूर्ति चांदी की है।

इस मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि इसे बहुत समय पहले जंस्कार (लद्दाख) के बौद्ध मतावलंबी भोंटों ने मंदिर में चढ़ाया था। इसलिए इस मूर्ति को भोट मूर्ति भी कहते हैं। इन मूर्तियों पर कई प्रकार के आभूषण सजे हैं। मंदिर के सामने खुला मैदान है, जहां यात्री खड़े हो सकते हैं। इस देवी पीठ के बारे में कई किवदंतियां हैं।
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ऐसा कहा जाता है कि जब भी किसी शासक ने मचैल के रास्ते से होकर जंस्कार या लद्दाख के अन्य क्षेत्र पर चढ़ाई की तो अपनी विजय के लिए माता से प्रार्थना और मन्नत जरूर मांगी थी। सेना नायकों और योद्धाओं की इष्ट देवी होने के कारण ही इनका नाम रणचंडी पड़ा। जोरावर सिंह, बजीर लखपत जैसे सेना नायकों ने जब जंस्कार (लद्दाख) पर चढ़ाई की तो इस मार्ग से गुजरते हुए मां से प्रार्थना की और विजय हासिल की थी।

1947 में जब जंस्कार क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में आ गया तो भारतीय सेना के कर्नल हुकम सिंह ने माता के मंदिर में मन्नत की और जब वह जीत कर आए तो मंदिर में भव्य यज्ञ के आयोजन के साथ-साथ देवी की धातु की मूर्ति स्थापित की गई। दूसरी मूर्ति कर्नल द्वारा चढ़ाई गई मूर्ति है।

पहले यह स्थान इतना प्रसद्धि नहीं था। लेकिन जब ठाकुर कुलवीर सिंह पाडर क्षेत्र में पुलिस अधिकारी के रूप में नियुक्त थे तो उनका भी मचैल आना हुआ। यहां उन्हें माता की भव्यता और कृपा का एहसास हुआ और वह माता की भक्ति में लग गए। उन्होंने सन 1981 में मचैल यात्रा का प्रारंभ किया। पहले यह यात्र छोटे से समूह तक ही सीमित थी, लेकिन किश्तवाड़ और गुलाबगढ़ का मार्ग खुलने के बाद यात्रियों की संख्या बढ़ते-बढ़ते हजारों में पहुंच गई।

मचैल यात्रा भाद्रपद के दो दिन बाद 18 अगस्त से चनौत गांव से प्रांरभ होती है। छड़ी में हजारों लोग ढोल, नगाड़ों, ढोंस नरसिंघे जैसे आंचलिक वाद्ययंत्रों के सुरीले और दिव्य रागों के साथ मां के जयकारे लगाते हुए चलते हैं।
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