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सिकुड़ रहे ग्लेशियर: बादल फटने की घटनाओं का अध्ययन करेगा केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू

Tue, 09 Aug 2022 11:31 AM IST
kumar गुलशन कुमार मंगेश कुमार, जम्मू

सार

ग्रेटर हिमालय क्षेत्र में झीलों के बढ़ने, ग्लेशियरों के सिकुड़ने और वनस्पति व जीव तंत्र पर केंद्रित शोध किया जाएगा। डेटा जुटाकर आने वाले समय में आपदाओं के खतरे से सचेत किया जाएगा।
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ग्लेशियर (फाइल) - फोटो : संवाद
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विस्तार
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लद्दाख और हिमाचल प्रदेश से सटे जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन से बादल फटने की घटनाएं भी बढ़ गई हैं। पिछले 20 वर्ष के अध्ययन में पर्यावरण वैज्ञानिकों ने ग्लेशियर पर बनने वाली झीलों की संख्या भी अधिक पाई है। इस संवेदनशील क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का जनजीवन, वनस्पति और जीव जंतुओं पर पड़ रहे असर का अब व्यापक अध्ययन किया जाएगा।

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केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू के पर्यावरण विभाग की ओर से प्रस्तावित तीन साल की परियोजना को राष्ट्रीय डेवलपमेंट फाउंडेशन की ओर से मंजूरी दी गई है। पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुनील धर रिमोट सेंसिंग के माध्यम से इसके मुख्य शोधकर्ता होंगे। डॉ. सुनील धर ने बताया कि किश्तवाड़ जिला एक तरफ से लद्दाख और दूसरी तरफ हिमाचल के लाहौल-स्पीति से सटा है। इसका पर्यावरण हिमाचल की तरह ही संवेदनशील है।

इस पर विस्तार से शोध नहीं हुआ है। तीन साल की परियोजना में ग्रेटर हिमालय क्षेत्र में झीलों के बढ़ने, ग्लेशियरों के सिकुड़ने और वनस्पति व जीव तंत्र पर केंद्रित शोध किया जाएगा। डेटा जुटाकर आने वाले समय में आपदाओं के खतरे से सचेत किया जाएगा। डॉ. धर ने बताया कि वे हिमाचल पर शोध कर चुके हैं। वहां औसतन 13 से 14 मीटर की दर से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। किश्तवाड़ के ग्लेशियर हर साल 12 मीटर की दर से सिकुड़ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर की स्थिति का पता लगाने के लिए शोध करने का लक्ष्य रखा गया है।
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इन क्षेत्रों पर होगा फोकस
किश्तवाड़ के मड़वा, दच्छन, वाड़वान, पाडर-मचैल, भोट नाला क्षेत्र समेत आसपास के इलाकों पर जलवायु परिवर्तन के असर का अध्ययन किया जाएगा। इन इलाकों में सबसे ज्यादा बादल फटने और बाढ़ की घटनाएं सामने आ रही हैं। अध्ययन में जनजीवन, वनस्पति और जीव-जंतुओं पर पड़ रहे प्रभाव के आंकड़े जुटाए जाएंगे।

चिनाब नदी से सटे सभी इलाके प्रभावित
चिनाब नदी हिमाचल के लाहौल-स्पीति से लेकर किश्तवाड़, डोडा, रामबन, रियासी से लेकर जम्मू से होकर गुजरती है। बादल फटने या बाढ़ आने पर इन सभी जिलों पर इसका व्यापक असर पड़ता है। ग्लेशियर और नदी की स्थिति के प्रभाव क्षेत्र अध्ययन का हिस्सा होंगे।

सिक्किम की तरह ग्लेशियर की झीलें खाली करनी होंगी
डॉ. धर के अनुसार ग्लेशियर पर बनी झीलें कभी भी आपदा का कारण बन सकती हैं। अभी तक के अध्ययन के मुताबिक किश्तवाड़ के ग्लेशियरों पर बनी झीलों को खाली करने के लिए सिक्किम समेत अन्य पूर्वोत्तर राज्यों की तर्ज पर प्रयास करने की जरूरत है।

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