गिरधारी लाल डोगरा। रियासत की सियासत में स्वर्गवास के 28 साल बाद भी हर पार्टी में सम्मान के साथ लिया जाने वाला नाम। जम्मू-कश्मीर की राजनीति में पांच दशक तक छाए रहने वाले डोगरा सियासत को जन सेवा का आधार बना महान बन गए।
आदर्शों पर आधारित राजनीति करने वाले गिरधारी लाल डोगरा अपने सियासी जीवन में कोई चुनाव नहीं हारे। रियासत की सियासत में अपनी सादगी और जनहित में नि:स्वार्थ भाव से काम करने के जो सिद्धांत छोड़ गए, वह राजनेताओं के लिए प्रेरणा बने रहेंगे।
कठुआ जिले की हीरानगर तहसील के भैया गांव में किसान भीम मल के घर 17 जुलाई 1915 में जन्मे गिरधारी लाल डोगरा अपने गांव में दसवीं कक्षा पास करने वाले पहले विद्यार्थी बने। लाहौर के पंजाब विश्वविद्यालय से एलएलबी करने के साथ-साथ वह देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे।
पांच बार विधायक रहे डोगरा
देश को 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता मिलने के बाद और महाराजा हरि सिंह के जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में करने के बाद पाकिस्तान ने जब जम्मू-कश्मीर में अपनी सेना के माध्यम से हमला किया और सांप्रदायिक दंगे करवाए तो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गिरधारी लाल डोगरा की क्षमता को देखते हुए उन्हें जिला कठुआ का आपात अधिकारी तैनात किया।
उन्होंने प्रधानमंत्री के विश्वास को कायम रखते हुए जिले में सांप्रदायिक सौहार्र्द लाने में काफी मदद की। 1948 में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के रियासत के प्रधानमंत्री बनने पर डोगरा को वित्त मंत्री बनाया गया। वह लगातार 27 साल तक 1975 तक रियासत के वित्त मंत्री रहे और हीरानगर विधानसभा क्षेत्र से 1952 में मनोनीत होने के बाद 1957 से लेकर 1975 तक लगातार पांच बार विधानसभा चुनाव जीते।
1980 में जम्मू-पुंछ लोकसभा सीट और 1984 में उधमपुर-कठुआ संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर वह संसद में पहुंचे और वहां भी उन्हें पूरा सम्मान मिला। 1987 में 72 साल की आयु में देहांत होने तक वह सांसद के रूप में देश की सेवा करते रहे।
'पिता के साथ रोल माडल थे गिरधारी लाल डोगरा'
गिरधारी लाल डोगरा की बड़ी बेटी एवं केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की पत्नी संगीता जेटली का कहना है कि उनके पिता जनता के नेता थे। जीवन भर वह लोगों की समस्याओं का निराकरण करने के लिए निष्ठा भाव से लगे रहे।
उनका कहना है कि हीरानगर विधानसभा क्षेत्र का पांच बार प्रतिनिधित्व करने के दौरान उनके पिता ने रोजगार, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण पर जोर दिया और उसमें कामयाबी भी हासिल की।
क्षेत्र के ज्यादातर लोग सरकारी सेवाओं में है। अगर रोजगार और शिक्षा हो तो समस्याओं का हल हो सकता है। जेटली का कहना है कि पिता जम्मू संभाग के तो नेता थे ही, कश्मीर में भी उनका पूरा सम्मान था।
जम्मू से ज्यादा कश्मीर से लोग उनके पास समस्याओं का निराकरण करवाने पहुंचते थे। यह उनकी महान शख्सियत को दर्शाता है।