सांबा। एक समय था जब गौरेया ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह के समय मीठी मीठी आवाजें निकालती थी लेकिन मोबाइल के आने और टावर लगने से गौरेया लुप्त होने लगी है।
पहले झुंड के झुंड घरों की छत पर बैठकर मौज मस्ती करते थे। कई बार तो ये कच्चे मकानों में अपने घोंसले बना लेती थीं। वे वहां अंडे देकर बच्चों का पालन पोषण करती थीं। 85 वर्षीय बुजुर्ग कृष्ण लाल ने बताया कि गौरेया को घरों के आंगन में व छत में दाना डाला जाता था। कई बार गर्मी के दौरान उनके पीने के लिए पानी तक की व्यवस्था की जाती थी। बर्तन को पानी से भरकर छत पर रख दिया जाता था। जब से मोबाइल का आना शुरू हुआ और टावर लगे तो गौरेया भी लुप्त होने लगी।