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ऊंचे पर्वतों से तवी किनारे लौटे गरुड़

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इस साल जून माह में जब पारे ने 40 के पार छलांग लगाई थी, तो तवी के किनारे हजारों की तादाद में रहने वाले बाज अचानक ही ऊंचे पर्वतों की ओर उड़ गए थे। अब वे फिर से लौट आए हैं। इस बहादुर पक्षी को ऊंचाई बेहद पसंद है।
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यहां तक कि जब तूफान आता है और सारे पक्षी अपने घोसलों या सुरक्षित जगहों पर छुपना पसंद करते हैं, तब बाज ऊंचे आसमान में आराम से अपने पंखों को फैलाकर आराम करता है। इसे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड की सात हजार फुट से ज्यादा ऊंचाई वाले पर्वतीय इलाके ज्यादा पसंद हैं।

हालांकि जब वहां बर्फ गिरने का समय आता है, तब वे मैदानों की तरफ रुख कर जाते हैं। ठीक इसी तरह जब मैदान में तापमान काफी ज्यादा हो जाता है, तो वे पर्वतीय इलाकों की ओर उड़ान भर लेते हैं। यह मजेदार तथ्य है कि इंसानों में कमोवेश इसी तरह का पलायन गुज्जर बक्करवाल भी करते हैं।
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यहां खूब मिलता है खाना

जाड़ा शुरू होने के पहले सितंबर-अक्तूबर माह में बाज तवी के किनारे लौटना शुरू कर देते हैं। सूर्य पुत्री तवी न सिर्फ जम्मू की जीवन रेखा है, वरन यह अनगिनत पशु-पक्षियों को भी शरण और आहार देती है। इसमें बहुतायत में पाई जाने वाली मछलियों के चलते ही बाज को भी इसका साथ बेहद पसंद है।

मछलियों के अलावा तीतर, खरगोश, सांप, चूहे आदि भी तवी के किनारे बहुतायत में मिलते हैं, जिन्हें बाज अपना आहार बनाते हैं। तवी के किनारे मुख्य पुल के नीचे तवी में झपट्टा मारकर मछलियों को शिकार करते हुए देखना बड़ा रोमांचक लगता है। इनके आने के साथ ही तवी का किनारा एक बार फिर से गुलजार हो गया है।
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संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट की दरकार

बाज के संरक्षण के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से अभी तक कोई प्रोजेक्ट नहीं शुरू किया गया है, जबकि कई राज्यों में इस पक्षी की संख्या में बहुत ज्यादा गिरावट आई है। पंजाब में खेती में डीडीटी के बहुत ज्यादा इस्तेमाल ने बाज की प्रजनन क्षमता पर बहुत बुरा असर डाला है। हालत यह है कि अब पंजाब में बाज विलुप्त होने के कगार पर हैं।

मोबाइल टावर भी बन रहे दुश्मन
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के वेटलैंड प्रोग्राम इन वेस्टर्न हिमालय के इंचार्ज डॉ. पंकज चंदन के अनुसार ग्लोबल वार्मिगिं, रासायनिक प्रदूषण, जंगलों की कमी के साथ ही मोबाइल टावरों से निकलने वाली घातक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन ने बाजों को मौत के मुंह में धकेलने का काम किया है।
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