लद्दाख के सांसद जाम्यांग सेरिंग नामग्याल
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लद्दाख के सांसद जाम्यांग सेरिंग नामग्याल ने कहा है कि एलओसी के उस पार जिस तरह से पीओके कहलाता है, एलएसी के पार अक्साई चिन भी चीन के कब्जे वाला लद्दाख कहलाया जाना चाहिए। सांसद ने कहा कि वर्ष 1962 के युद्ध में चीन ने 37,244 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के लद्दाख को कब्जा लिया।
अक्साई चिन असल में चीन के कब्जे वाला लद्दाख है, जिसे वापस लेने का समय आ गया है। सांसद ने कहा कि पुलवामा हमले के बाद देशभर में जो जज्बात थे, वैसे ही गलवां घाटी की घटना के बाद भी हैं। ऐसे में चीन को करारा जवाब देने के लिए केंद्र की मंशा को लेकर किसी में कोई शंका नहीं होनी चाहिए। चीन के कब्जे वाला इलाका असल में चरवाहों की लाइफलाइन हैं। इसे छुड़ाना मुश्किल जरूर है लेकिन नामुमकिन नहीं।
दशकों से नई एलएसी बनाता आ रहा चीन, अब खदेड़ने का वक्त
एलएसी पर इन दिनों हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। लद्दाखियों की नजर में चीन दशकों से जमीन हड़प रहा है और जमीनी स्तर पर नई एलएसी बना चुका है। लद्दाखियों को उम्मीद है कि तनाव के बीच गलतियों की समीक्षा कर चीन को एलएसी से पीछे धकेला जाएगा।
लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के पूर्व अध्यक्ष रिग्जिन स्पलबार के अनुसार 1962 से एलएसी एकदम बदल चुकी है। साठ वर्षों में केंद्र की नीति ढुलमुल रही है। कमजोरी का फायदा उठाकर चीन हर साल नई एलएसी बनाने की फिराक में रहा। इस बार कब्जाए गए इलाकाें से चीन को पीछे धकेलना होगा। एक अन्य प्रतिनिधि ने कहा, जमीन वापस लेने के लिए ठोस कार्रवाई जरूरी है।
एलएसी पर तिब्बती चरवाहे बसा रहा ड्रैगन
लद्दाखियों के अनुसार चीन ने तिब्बती चरवाहों के लिए तमाम तरह की सुविधाएं दे रखी हैं। वह चरवाहों को इस्तेमाल करता है, जबकि एलएसी के इस पार चरवाहों को न तो सुविधाएं मिलती हैं और न ही इन्हें एलएसी पर जाने दिया जाता है। इस तरफ के चरवाहों को भी अग्रिम रक्षा पंक्ति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।