ज्ञात हो कि भारत और पाकिस्तान के बीच डीजीएमओ स्तर पर संघर्षविराम समझौते के बाद से एलओसी से सटे इलाकों में रहने वाले लोगों ने राहत की सांस ली है। उनका कहना है कि इस समझौते के बाद आखिर वह कई दशकों के बाद रातों में चैन की नींद सो पा रहे हैं। बांडी कमलकोट के मोहम्मद शेख (76) ने कहा कि उनके गांव से एलओसी तीन किलोमीटर दूर है। जब भी पाकिस्तान की ओर से गोलाबारी होती थी तो यहां दहशत का माहौल पैदा हो जाता है। शेख ने बताया कि यहां उनके पास सिर छुपाने के लिए कम्युनिटी बंकर भी नहीं हैं।
बताया कि आए दिन पाकिस्तान सीजफायर का उल्लंघन करता रहता था, इस कारण यहां के 12-13 गांवों के लोग प्रभावित होते थे। इसमें बांडी, कमलकोट, दुलानजा, कुंडी बरजाला, माजियां, नजियां आदि गांव आते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार से अब उम्मीदें नहीं हैं क्योंकिक जब भी नुकसान होता था तो मामूली सा मुआवजा मिलता था। अब डीजीएमओ स्तर पर समझौते के बाद राहत महसूस कर रहे हैं। अब रात में चैन की नींद सो सकते हैं।
13 नवंबर 2020 को हुई गोलाबारी की घटना में नुकसान उठाने वाले सराए बांडी के करामात कयूम (83) ने बताया कि उस दिन हुई गोलाबारी में गोली लगने से उनके बेटे इरशाद हुसैन (45) की एक राशन डिपो पर मौत हो गई। इरशाद की 4 बच्चियां, 2 बेटे और बीवी है। अब वह कैसे परिवार का पेट पालेंगे। मुनीर हुसैन (43) ने बताया कि उसी दिन उनके भाई नादर हुसैन (45) राशन डिपो पर मुंशी के साथ हेल्पर के तौर पर काम करते थे, गोलाबारी में बुरी तरह घायल हुए। एक महीने से अधिक समय तक उन्हें अस्पताल में इलाज के लिए रखा गया। उनकी दोनों टांगें काटनी पड़ी। वह वेंटिलेटर पर थे, हमने उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन अल्लाह के फजल से वो बच गए। लेकिन उस हादसे ने दुनिया ही पलट दी। रेडक्रॉस की ओर से 40 हजार रुपये दिए गए, लेकिन सरकार की ओर से कोई मदद नहीं की गई। इलाज पर करीब 5 लाख रुपये खर्च आया था। सीजफायर समझौते के बाद राहत मिली है।
गोलाबारी में हुआ बड़ा नुकसान
बता दें कि 13 नवंबर 2020 को पाकिस्तान की ओर से एलओसी के करीब बारामुला के उड़ी सेक्टर, नौगाम सेक्टर, बांदीपोरा के दावर सेक्टर, कुपवाड़ा के केरन सेक्टर में गोलाबारी की गई थी। इसमें छह स्थानीय नागरिक मारे गए थे जबकि सेना के 4 जवान और 1 बीएसएफ का जवान शहीद हुआ था। जबकि करीब 20 से अधिक लोग घायल हो गए थे।