कश्मीर घाटी में इन दिनों बाढ़ से हर ओर हाहाकार है। इस हाहाकार से अपनी जान बचाते हुए चार दिनों तक पैदल चलकर विभिन्न पहाड़ी दुर्गम मार्गों के जरिये मंगलवार को रामबन में करीब 75 श्रमिक पहुंचे, जिन्होंने धर्मार्थ ट्रस्ट कम्यूनिटी हाल में शरण ली है। श्रमिक झारखंड, बिहार तथा पश्चिमी बंगाल के रहने वाले बताए जा रहे हैं।
रामबन में श्रमिकों के पैदल जैसे-तैसे पहुंचने पर रामबन के समाज सेवक सुरिंदर तथा विजय ने उन्हें ऐसे हालात में देखा और उनसे उनके द्वारा पूछे जाने पर जानकारी मिली कि वे घाटी में आई भीषण बाढ़ की चपेट में आए थे और जैसे-तैसे पैदल ही वहां से निकलकर चार दिन बाद रामबन पहुंचे हैं।
समाज सेवकों द्वारा उन्हें धर्मार्थ ट्रस्ट के कम्यूनिटी हाल में ठहराया गया है। रामबन ट्रैफिक पुलिस कंट्रोल रूम के मुताबिक मंगलवार शाम को पैदल ही पैरों में बगैर चप्पल जूते श्रमिकों के रामबन पहुंचने पर उनके दुख भरे हालात को सुनकर उनके ठहराने की व्यवस्था की गई।
पैसे कमाने गए थे, जान बचाकर लौटे
रामबन डीसी तथा एसएसपीको इसके बारे में अवगत कराया गया तथा इसके बारे में प्रशासन की ओर से कहा गया है कि श्रमिकों को बुधवार को जम्मू पहुंचाए जाने की व्यवस्था की जाएगी, ताकि वे अपने राज्यों और घरों को लौट सकें।
रामबन कम्युनिटी हाल में पहुंचे बंगाल के रहने वाले हुसैन अली बंगाल से चलकर खेतीबाड़ी करने जा रहे थे वहीं, बिहार नेपाल बोर्डर के रहने वाले श्रमिक ने बताया कि वह चार पांच दिनों से जैसे तैसे यहां तक पहुंचे हैं। पैसे तक भी नहीं हैं कि वे अपने घर तक पहुंच पाएं।
वहीं रामबन रघुनाथ मंदिर के पुजारी शामलाल शर्मा ने भी उन्हें चाय नाश्ता बंदोबस्त करने का आश्वासन दिया है जबकि रामबन के तहसीलदार ओमप्रकाश भी डीसी के निर्देश पर श्रमिकों के ठहराने तथा उनके खानपान के बंदोबस्त में जुटे रहे।
खुद तैरकर पहुंचे एयरपोर्ट
घाटी में आई बाढ़ में छत पर फंसे सचिवालय कर्मचारियों ने मदद के लिए काफी आवाज लगाई, लेकिन कोई उन्हें बचाने नहीं पहुंचा। बाद में खुद ही तैरकर श्रीनगर एयरपोर्ट पहुंचे। फिलहाल वे एयरपोर्ट पर ही हैं। श्रीनगर के तुलसीबाग में सचिवालय कर्मचारी तरसेम सिंह सलाविया, धर्मपाल तथा एक अन्य बाढ़ में फंस गए। बचने के लिए उन्होंने छत पर शरण ली।
दिन रात मदद की आस लगाए बैठे रहे। इस दौरान उन्होंने उधर से गुजर हेलीकाप्टर को मदद के लिए आवाज लगाई, हाथ हिलाकर इशारा किया, लेकिन सारे प्रयास व्यर्थ रहे। पिछले तीन दिनों से बिना खाना-पानी के फंसे इन कर्मचारियों का धैर्य मंगलवार को जवाब दे गया और उन्होंने खुद ही अपनी मदद करने का फैसला किया।
तरसेम सिंह की पत्नी त्रिशाला सलाविया ने बताया कि तीन दिन से तीनों लोग छत पर बैठकर प्राणरक्षा कर रहे थे। खाने-पीने तक का इंतजाम नहीं किया गया। बाद में वे खुद ही बाढ़ की पानी में तैरकर एयरपोर्ट तक पहुंचे।
कार छोड़ पकड़ा पहाड़ का रास्ता तो बची जान
घाटी में बाढ़ में फंसे लोगों ने सकुशल जम्मू पहुंचने पर अपना दर्द बयां किया है। उन्होंने घाटी का मंजर बहुत भयानक बताया है। कुछ लोगों को सेना ने निकाला तो कई जान जोखिम में डाल पहाडि़यों को पार कर घर लौटे हैं। यह लोग अपने वाहनों को पुलिस के हवाले कर आए हैं। ऐसा ही दर्द बयान किया है बाबा के तालाब में रहने वाले तिलक राज ने।
उन्होंने बताया कि वह चार सितंबर को बेटे को लेकर श्रीनगर के लिए निकले थे। उनके बेटे की इंजीनियरिंग कालेज में दाखिले के लिए काउंसिल थी। बारिश जम्मू से ही शुरू हो गई थी। फिर भी वह कार से किसी तरह काजीगुंड तक पहुंच गए। इसके आगे जाने पर लोगों ने उन्हें रोका और बताया कि वह आगे ना जाएं। वह चार दिनों तक काजीगुंड़ में फंसे रहे।
यहां बड़ी संख्या में लोग फंसे थे। इनमें से बहुत से ऐसे थे जो अपने बच्चों को लेकर काउंसिल के लिए जा रहे थे। सात सितंबर को वह किसी तरह गाड़ी लेकर बनिहाल पहुंचे। वहां पर अपनी गाड़ी पुलिस के सुपुर्द कर बेटे को लेकर पैदल ही घर की ओर चल पड़े। बनिहाल के पास सड़क मार्ग बह गया था, जिसे पार करना मुश्किल था।
स्थानीय युवक से जानकारी लेने पर उन्होंने बेटे के साथ पहाड़ का रास्ता पकड़ लिया जो कि बहुत खतरनाक था। किसी तरह वह रामसू में पहुंचे। उसके बाद कभी मेटाडोर और कभी अन्य वाहन, तो कभी पैदल ही घर की ओर चलते रहे। आठ तारीख की रात को किसी प्रकार वह घर पहुंचे तो राहत की सांस ली।