हफ्ते भर पहले तक सूखे की मार झेल रहे जम्मू कश्मीर में कुदरत ने ऐसी पलटी खाई कि लोग अब बारिश और बाढ़ से बेहाल हैं। जम्मू से लेकर श्रीनगर तक घाटी में हर तरफ बाढ़ से हुई बर्बादी के निशां दिखाई दे रहे हैं। किसी का घर छूटा तो किसी के खेत खलिहान पानी में डूब गए, कुछ बदनसीब ऐसे भी रहे जिनके अपने उनकी आंखों के सामने ही इस बाढ़ में बह गए और वो सिवाय देखते रहने के कुछ न कर पाए।
कुदरत के कहर के आगे हर कोई बेबस है। लोगों की मानें तो पिछले 30-35 सालों में उन्होंने बर्बादी का ऐसा मंजर नहीं देखा, बढ़े बुजुर्ग तो कहते हैं कि पिछले साठ सालों में बारिश से ऐसी तबाही नहीं आई। जम्मू की तवी से लेकर, अखनूर का चिनाब दरिया और श्रीनगर की झेलम सारी नदियां खतरे के निशान से ऊपर हैं। लोग बेबस हैं और कुदरत नाराज।
कुदरत का बनाया स्वर्ग कहा जाने वाला जम्मू कश्मीर आज कुदरत की ही मार से बेजार है। बीते मंगलवार से शुरू हुई बारिश लोगों को बर्बाद करने पर तुली है। बारिश और बाढ़ का कहर ऐसा है कि अब तक 80 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, तो सैकडों लापता हैं, जबकि हजारों की आबादी जिंदगी बचाने की जद्दोजहद में लगी है।
300 से ज्यादा गांव बाढ़ की चपेट में
घाटी के 300 से ज्यादा गांव पूरी तरह बाढ़ की चपेट में हैं, यहां लोग पल-पल मौत से संघर्ष कर रहे हैं। पूरी रियासत के नदी नाले रह-रह कर ऊफान मा रहे हैं मानों आज वो सबकुछ अपने आगोश में समा ले जाने को अमादा हैं। बाढ़ के इस कहर में हर किसी का अपना दर्द है। दो दिन पहले अपने परिवार और दर्जनों बारातियों के साथ दूल्हन लेने निकला एक दूल्हा भरी बस के साथ नदी में समा गया।
जिसका आज तक कुछ पता नहीं चल सका है। परिवार के जो लोग साथ थे वो बह गए, जो बचे उनकी सूनी आंखे दरवाजों पर ही टिकी हैं जाने कब कौन अपना लौट आए। मंगलवार को पुंछ में डोक में बैठा एक परिवार बारिश से बचने के लिए अंदर ही दुबका बैठा था लेकिन मौत ने वहां भी उसे अपनी आगोश में ले लिया। बारिश से धराशायी हुआ एक पेड़ डोक पर गिरा और चार बच्चों सहित उनकी मां की मौत्ा हो गई।
पुंछ के एक गांव में दर्जनभर लोग खड़े खड़े पुलस्त नदी में समा गए जिनका अभी तक कुछ पता नहीं चल सका है। घरवालों का रो रो कर बुरा हाल है, लेकिन कोई उन्हें दिलासा दे भी तो क्या। शायद उन्हें भी मालूम है कि अब शायद ही कोई लौट कर आ पाए।
बारिश खूब देखी लेकिन ऐसी बर्बादी कभी नहीं
राजौरी निवासी हनीफ आलम कहते हैं कि उम्र के छह दशक देख लिए लेकिन ऐसी बर्बादी कभी नहीं देखी। पुंछ में फलों का कारोबार करने वाले फुरकान भाई बताते हैं कि बहुत बारिश देखी लेकिन ऐसा आलम पहली बार देखा है। शहर की पुलस्त नदी का ऐसा डरावना रूप पहली बार देखने को मिल रहा है।
श्रीनगर निवासी बुजुर्ग शौकत मियां बताते हैं कि 70 साल की उम्र में मेरी याद में कभी ऐसा वाकया नहीं आया जब झेलम को इस तरह ऊफान मारते देखा हो। पता नहीं कितनी शाम इसके किनारे कटी हैं लेकिन आज इसको देखकर डर लग रहा है। कई दिन हो गए पानी शहर से उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। बारिश खूब देखी लेकिन ऐसा आलम कभी नहीं देखा। दो दिन से अपने दोनों बेटों और पोते पोतियों के साथ एक स्कूल में शरण लिए हुए हैं। सेना वाले ही खाने पीने का सामान मुहैया करा रहे हैं।
बुजुर्ग शौकत मियां जैसी ही सैकडों कहानी आज घाटी की हकीकत बन गई है। जिधर देखो उधर पानी ही पानी नजर आ रहा है। ऐसा भी नहीं है कि इससे राहत मिलने की कुछ उम्मीद हो, क्योंकि अगले तीन दिन और ऐसे ही रहने की आशंका जताई जा रही है। एक बड़ी दिक्कत ये भी है कि लगातार बारिश के चलते राहत कार्यों में भी तेजी नहीं आ पा रही है। हालांकि हुक्मरान पूरी तैयारियों और लोगों को राहत देने की बात कर रहे हैं लेकिन हर कोई जानता है उनके वादों और इरादों की हकीकत।