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केएएस में पहली बार चुने गए देविका नगरी के युवा

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सब्बा नूर उत्साहित होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की परीक्षा की तैयारियों में जुट गई है। नई दिल्ली से वापस लौटी सब्बा के अनुसार उसकी शुरू से तम्मना थी कि वह समाज के लिए सेवा करे। इसलिए उसे डाक्टर बनने की चाह थी। उसने एमबीबीएस की परीक्षा भी दी।
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उसका चयन आयुर्वेद में हो गया, लेकिन उसने अपनी शिक्षा जारी रखी और जम्मू विश्वविद्यालय में जियोलाजी विभाग में एडमिशन ले लिया। प्रतिभा से धनी सब्बा मिस स्कूल और गर्वनमेंट महिला कालेज में मिस कालेज भी रही है। उसके अनुसार जम्मू विश्वविद्यालय जाकर ही उसे प्रेरणा मिली कि उसे भी केएएस की तैयारी करनी चाहिए।

हालांकि वह परीक्षा देने के लिए तैयार नहीं थी। मां परवेज अख्तर ने उसे प्रेरित किया। हौसला और विश्वास के साथ उसने परीक्षा दी और पहली बार में टाप पर आना उसके लिए सपने से कम नहीं था। परिवार में उसे सबका साथ मिला। पिता नूर मोहम्मद के अनुसार उसने कभी भी अपनी बेटी को रोका नहीं।
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वह खुद आठवीं पास है और बैकग्राउंड भी शिक्षित परिवार से नहीं होने के बावजूद सब्बा शुरू से ही मेधावी छात्रा रही है। लड़कियों को बाहर अकेले भेजने में भी लोग डरते हैं। उन्होंने अपनी बेटी को कभी नहीं रोका और न ही टोका। कोई कोचिंग भी नहीं दिलाई। टाप आना उनके परिवार व उधमपुर के लिए गर्व की बात है।

सब्बा ने कहा कि प्रोफेट मोहम्मद की बातों ने उसे समाज के लिए कुछ करने के लिए प्रेरणा दी। दूसरे नंबर पर आई उधमपुर की रूपाली वेद ने भी लड़कियों को शिक्षा क्षेत्र में आगे आने का संदेश दिया।
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ड़कियों को मौका देना चाहिए

योगराज परिवार की पुत्री मोनिका एमए की शिक्षा जम्मू यूनिवर्सिटी से ग्रहण कर रही थी। उसने अमर उजाला को फोन पर बताया कि डोडा के कई दूरदराज गांवों में लड़की को अब भी बोझ समझा जाता है।

लेकिन लड़कियों को हिम्मत नहीं हारना चाहिए। अभिभावकों को भी अपनी लड़कियों को मौका देना चाहिए।

वह भी लड़कों से कम नहीं होतीं। बता दें कि मोनिका ने मात्र 23 वर्ष की उम्र में केएएस पास की है। जिले में यह भी रिकार्ड है।
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'अध्यापकों को कम शिक्षित माना जाता है'

धंधल निवासी अब्दुल रहमान की पुत्री शाजिया ने 25 वर्ष की उम्र में इस प्रतिष्ठित परीक्षा को पास किया है। यह भमाग ब्लाक की केएएस करने वाली पहली लड़की बन गई है। शाजिया 10वीं और 12वीं की शिक्षा ग्रीन माडल हायर सेकेंडरी से ली।

भद्रवाह कालेज में ग्रेजुएशन करने के बाद वह अपने गांव में ही आरटीआई अध्यापिका लगी। साथ ही केएएस की तैयारी करने लगी। शाजिया ने बताया कि आईईटी लगने वाले अध्यापकों को कम शिक्षित माना जाता है। परंतु यह गलत है।

क्षेत्र में प्रतिभा की कोई भी कमी नहीं है। प्रोत्साहन की बहुत कमी है। खास कर गांवों में अब भी बहुत पिछड़ापन है। यहां जब आईएएस-केएएस की जानकारी होती है, तब तक आधी उम्र निकल चुकी होती है।

डाक्टर और इंजीनियर बनना ही हर किसी की चाहत बन जाती है।
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