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भाजपा के लिए पांचवें चरण में प्रतिष्ठा की जंग

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पांचवें और अंतिम चरण के मतदान के लिए समीकरण बिल्कुल बदले हुए हैं। अब तक हुए चार चरणों के चुनाव में कश्मीर घाटी में पैठ बनाने की रणनीति पर काम कर रही थी। नेशनल कांफ्रेंस के किले में सेंध की कोशिशों ने पीडीपी को उलझाए रखा। कांग्रेस घाटी और लद्दाख में अपनी सीटें बचाने के लिए जद्दोजहद करती दिखी।
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लेकिन अंतिम चरण में बीस सीटों पर होने वाले मतदान में भाजपा मजबूत किले को सुरक्षित रखते हुए बढ़त बनाने की चुनौती से रू-ब-रू है। भाजपा के मिशन 44 प्लस का सारा दारोमदार इसी चरण के मतदान पर है।

लिहाजा पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। जम्मू संभाग की इन सीटों पर भाजपा को अधिकांश सीटों पर कांग्रेस से मुकाबला संभावित है। नेकां और पीडीपी कुछ सीटों पर चुनौती खड़ी कर सकती है।
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कांग्रेस, नेकां और पीडीपी के लिए कड़ी चुनौती

पिछला विधानसभा चुनाव अमरनाथ भूमि आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुआ था। नतीजतन भाजपा को फायदा मिला और उसकी सीटें 11 पर पहुंच गईं। बाद में बिश्नाह के निर्दलीय विधायक अश्विनी शर्मा भी भाजपा में शामिल हुए।

इस तरह आंकड़ा 12 पर है। लेकिन इस सफलता के बाद की अंतरकथा और भी दिलचस्प बन गई, जब विधान परिषद के चुनाव में भाजपा विधायकों पर क्रास वोटिंग के आरोप लगे। पार्टी ने सात विधायकों को निलंबित कर दिया।

फिर जब मिशन 44 प्लस के लिए काम शुरू हुआ तो सभी निलंबित विधायकों को फिर से पार्टी में शामिल कर लिया गया। विरोध दलों ने इसके लिए भाजपा की आलोचना भी की।
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बागी भी बने चुनौती

विधायकों को पार्टी में लिए जाने की आलोचना बढ़ी तो पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया और इनमें से बनी के विधायक लालचंद बागी उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं। बसोहली के विधायक ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा और भाजपा के लिए चुनौती खड़ा कर रहे हैं।  

बीस में से अखनूर, गांधीनगर, राजोरी और बिलावर की चार सीटें कांग्रेस के पास हैं। कांग्रेस इन सीटों को बचाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। भाजपा ने इन सीटों पर सेंध के लिए पूरा जोर लगा दिया है।

कठुआ की सीट निर्दलीय चरणजीत सिंह के पास है और फिर से मैदान में हैं। नौशेरा और कालाकोट की दो सीटें नेकां के पास है जबकि दरहाल पर इस बार पीडीपी को भाजपा से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
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