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क्या है पुग्गे का व्रत जिसे सबसे पहले धर्मराज युधिष्ठिर रखा, आज डुग्गर प्रदेश में है इसकी धूम

Mon, 13 Jan 2020 02:54 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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श्रीगणेश संकट चतुर्थी का व्रत - फोटो : सोशल मीडिया
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डुग्गर संस्कृति में विशेष महत्व रखने वाला श्रीगणेश संकट चतुर्थी (पुग्गा) का व्रत आज मनाया जा रहा है। पुग्गे के व्रत को लेकर रविवार को बाजारों में खूब रौनक दिखी। ज्यादातर लोग पुग्गे के व्रत में गणेश जी को चढ़ने वाले गन्ने, मूली, आंवले, तिल की खरीदारी करते नजर आए। वहीं हलवाइयों की दुकानों पर पुग्गे की खरीदारी के लिए भी लोग उमड़े।

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महंत रोहित शास्त्री ज्योतिषाचार्य ने बताया कि यह व्रत मां अपनी संतान की रक्षा, लंबी आयु, मंगलकामना और भगवान श्रीगणेश जी की कृपा प्राप्ति के लिए करती हैं। इस व्रत को माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है। इस व्रत को संकट चौथ, गणेश चतुर्थी, तिलकुट चतुर्थी, संकटा चौथ के नाम से जाना जाता है।

पुग्गा व्रत के दौरान महिलाएं सबसे पहले श्रीगणेश जी की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराने के बाद फल, लाल फूल, अक्षत, रोली, मौली, दूर्वा अर्पित कर तिल से बनी वस्तुओं अथवा तिल और गुड़ से बने पुग्गे का प्रसाद लगाती हैं। इसके बाद व्रती महिलाएं रात्रि को चांद को अर्घ्य देकर श्रद्धापूर्वक बच्चों के नाम का पुग्गा निकालकर अलग रखती हैं। इसके साथ मूली, गन्ना भी रखा जाता है जिसे बाद में कुल पुरोहित व कन्याओं को बांटा जाता है। इसके बाद महिलाएं व्रत खोलेंगी। संकट चौथ के दिन 108 बार गणेश के मंत्र ऊं श्रीगणेश नम: का जाप करें।
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श्रीकृष्ण की सलाह पर धर्मराज युधिष्ठिर ने सबसे पहले संकट चौथ व्रत रखा

महंत रोहित शास्त्री के अनुसार जम्मू में इस बार पुग्गे के व्रत पर चंद्रोदय रात्रि 8:41 पर होगा। जिसके बाद महिलाएं चंद्र के दर्शन कर अर्घ्य देकर फल ग्रहण कर सकती हैं।

पहले इस व्रत को किसने किया
महाभारत काल में श्रीकृष्ण की सलाह पर पांडु पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने सबसे पहले संकट चौथ व्रत को ही रखा था। तब से लेकर अब तक सभी महिलाएं अपने पुत्र की सफ लता के लिए संकट चौथ व्रत रखती हैं।

डुग्गर संस्कृति में विशेष महत्व
डुग्गर संस्कृति में विशेष महत्व रखने वाला पुग्गे का व्रत मौसम के बदलाव से जुड़ा हुआ है। डुग्गर समाज में ऐसी मान्यता है कि पुग्गे के व्रत के साथ ही सर्दी में कमी आनी शुरू हो जाती है।
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