अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। दिल्ली बार एसोसिएशन समेत कुछ राज्यों की बार काउंसिल ने गर्मी को देखते हुए वकीलों को काला कोट न पहनने की छूट दी है। जम्मू के वकीलों का कहना है कि चाहे मौसम कितना भी गर्म क्यों न हो, हम अपनी पेशेवर पहचान से समझौता नहीं करेंगे। दिल्ली बार एसोसिएशन के इस फैसले पर जम्मू हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी ने साफ कहा है कि वह इस फैसले के पक्ष में नहीं है।
दिल्ली बार एसोसिएशन ने 24 मई को एक आदेश जारी करते हुए कहा है कि 16 मई से 30 सितंबर तक वकीलों को अदालत में पेश होते समय काला कोट पहनने की बाध्यता नहीं रहेगी। वकीलों को बाकी निर्धारित ड्रेस कोड का पालन जरूर करना होगा।
दिल्ली से पहले महाराष्ट्र और गोवा की बार काउंसिल ने एक मार्च से 30 जून तक और भोपाल की बार काउंसिल ने 15 अप्रैल से 15 जुलाई तक वकीलों को काले कोट से राहत देने का फैसला किया।
इस मुद्दे पर जम्मू के वकीलों की सोच बिल्कुल अलग है। जम्मू हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष निर्मल कोतवाल ने साफ शब्दों में कहा कि काला कोट हमारी पहचान है। बाकी जगहों का तो पता नहीं, लेकिन हम ऐसा कोई फैसला नहीं लेने वाले हैं। अगर कभी ऐसी कोई मांग या चर्चा होती है तो हम उसका विरोध करेंगे।
वरिष्ठ अधिवक्ता दीपिका महाजन ने भी कहा कि काला कोट हमारे शरीर का हिस्सा है। अगर हम इसे नहीं पहनेंगे तो अदालतों में हमें पहचानना मुश्किल हो जाएगा। सुरक्षा कर्मी तक हमें रोक सकते हैं। कोर्ट की मर्यादा और अनुशासन के लिए यह पहनावा जरूरी है।
पहचान से समझौता नहीं कर सकते
जम्मू बार के कोषाध्यक्ष राहुल अग्रवाल ने कहा कि हमारा पेशा अनुशासन और गरिमा से जुड़ा है। हम चाहे कितनी भी गर्मी में काम करें, लेकिन अपनी पहचान से समझौता नहीं कर सकते। अगर अदालतों में कोट हटेगा तो फिर वकील और आम आदमी में फर्क कैसे दिखेगा?
अधिवक्ता बिंदुसार अबरोल ने भी कहा कि गर्मी में मुश्किल होती है, लेकिन इसका हल यह नहीं कि हम ड्रेस कोड छोड़ दें। जरूरत इस बात की है कि अदालत परिसरों में पंखे, कूलर और आरामदायक बैठने की व्यवस्था हो, न कि वेशभूषा में ढील दी जाए।