जोशीमठ संकट के बाद केंद्र ने एजेंसियों को अंतरराष्ट्रीय सीमा या नियंत्रण रेखा के 100 किमी दायरे में आने वाली सभी सड़कों और राजमार्ग परियोजनाओं में पर्यावरण सुरक्षा उपायों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से लागू करने के निर्देश जारी किए हैं।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने छह फरवरी को मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की थी। इसके तहत सुरंग खोदने के दौरान आपदा प्रबंधन योजनाओं, जोखिम मूल्यांकन, पर्यावरण प्रभाव के अध्ययन और अन्य सावधानियां बरतने के निर्देश शामिल हैं। पर्यावरण अनुकूलन और सुरक्षित निर्माण को लेकर कराए जाने वाले ये अध्ययन प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान के माध्यम से कराए जाएंगे।
सात माह पहले समाप्त कर दी थी पर्यावरण मंजूरी की आवश्यकता
मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय सीमा या नियंत्रण रेखा के 100 किमी के दायरे में आने वाली राजमार्ग परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंजूरी की आवश्यकता को समाप्त करने के सात महीने बाद ये दिशानिर्देश जारी किए हैं। नए निर्देशों के तहत केंद्र ने एजेंसियों से परियोजनाओं का जोखिम मूल्यांकन कर एक आपदा प्रबंधन योजना तैयार करने को कहा है। मंत्रालय ने कहा कि इसे एक सक्षम प्राधिकारी से अनुमोदित कर लागू किया जाना चाहिए।
भूस्खलन, ढलान स्थिरता, भूकंपीय प्रभाव, जीवों, वनस्पतियों का रखा जाएगा ध्यान
मंत्रालय ने कहा, यदि प्रस्तावित मार्ग किसी पहाड़ी क्षेत्र से होकर गुजर रहा है, तो ऐसी स्थिति में भूस्खलन, ढलान स्थिरता का व्यापक अध्ययन किया जाएगा। इसके अलावा भूकंपीय गतिविधि और उसके चलते क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले जोखिम का भी ध्यान रखा जाएगा। कटान या तटबंध की स्थिति में मिट्टी के कटाव को नियंत्रित करने और भूस्खलन, चट्टान गिरने आदि को रोकने के उपाय करने होंगे। प्रस्तावित मार्ग में सुरंग की खुदाई या ड्रिलिंग की जरूरत पड़ने पर क्षेत्र की वनस्पतियों, जीवों, मौजूदा संरचनाओं पर निर्माण के चलते इन पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का अध्ययन किया जाएगा।
परियोजना के पहले और बाद में अपनाने होंगे एहतियाती उपाय
परियोजना प्रस्तावकों को भूस्खलन प्रबंधन योजना तैयार करनी होगी। वे निर्माण से पहले, उसके दौरान और बाद में उपचारात्मक और एहतियाती उपाय सुनिश्चित करेंगे। उन्हें सुनिश्चित करना होगा कि निर्माण कार्य शुरू करने से पहले सभी पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को विषय विशेषज्ञों की देखरेख में अनिवार्य रूप से लागू कर दिया गया है।
विकास परियोजनाओं को ठहाराया जा रहा है जोशीमठ आपदा का जिम्मेदार
उत्तराखंड के चमोली में स्थित जोशीमठ क्षेत्र के धंसने का कारण वहां बड़े पैमाने पर चल रही विकास परियोजनाओं को बताया जा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की ओर से जारी की गई उपग्रह छवियों में इस हिमालयी शहर को 12 दिनों में 5.4 सेंटीमीटर धंसा हुआ दिखाया गया था। यह क्षेत्र भूस्खलन की संभावना वाले एक कमजोर पहाड़ी ढलान पर स्थित है। शहर के आवासीय और व्यावसायिक भवनों, सड़कों और खेतों में चौड़ी दरारें आ गई हैं। कई भवनों को असुरक्षित घोषित कर निवासियों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित कर दिया गया है।
ठाठरी में 21 घरों में आई थी दरारें
जम्मू-कश्मीर को डोडा जिले के ठाठरी में भी इस माह की शुरुआत में 21 घरों में दरारें आ गई थीं। इसके बाद लोगों में दहशत फैल गई थी। जिला प्रशासन ने एहतियात बरतते हुए 19 परिवारों के 117 लोगों को सुरिक्षत स्थान पर भेज दिया था। इसका कारण जमीन का खिसकना बताया गया है।