देशभर की तरह जम्मू-कश्मीर में भी आपातकाल के खिलाफ विरोध के स्वर उठे थे। जगह-जगह सरकार के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन हुए थे। गलियों-मोहल्लों में सरकार के खिलाफ पोस्टर चिपकाए गए थे। खासकर बच्चों की टोलियां बनाई गईं थीं जो इस काम में जुटी थीं। गिरफ्तार लोगों को जेल में गंभीर यातनाएं दी जाती थीं। आपातकाल की काली याद के रूप में जम्मू-कश्मीर विधानसभा का छह साल का कार्यकाल 45 साल तक यहां के लोगों का पीछा करती रहीं। अनुच्छेद 370 हटने और राज्य पुनर्गठन अधिनियम लागू होने के बाद अब यह दाग मिट गया है।
आपात काल को याद करते हुए इसके पीड़ितों पूर्व रक्षा राज्यमंत्री प्रो. चमनलाल गुप्ता, पूर्व उप मुख्यमंत्री डा. निर्मल सिंह व कवींद्र गुप्ता का कहना है कि इंदिरा-शेख अब्दुल्ला सरकार ने बेइंतहा जुल्म ढाया। जेलों में बुरी तरह पिटाई की गई। यहां तक कि शरीर से खून बहते-बहते लोग बेहोश हो जाते थे। सरकार के खिलाफ नारे लगाने वालों को सड़क से घसीटते हुए थाने तक ले जाया जाता था। बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। इन्हें भी जेल में डाल दिया गया। इनकी भी डंडों से पिटाई की गई।
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आपातकाल लगाने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संसद और सभी राज्यों की विधानसभा का कार्यकाल छह साल कर दिया। आपातकाल हटा तो जनता पार्टी की सरकार ने इसे फिर से पांच साल कर दिया। यह व्यवस्था पूरे देश में लागू हो गई, लेकिन जम्मू-कश्मीर में छह साल का कार्यकाल चलता रहा। आपातकाल के वक्त राज्य में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की सरकार थी।
अनुच्छेद 370 का हवाला देते हुए इसे जारी रखा गया। कई बार विधानसभा में भी यह मामला उठाया गया कि देश के अन्य राज्यों की तरह यहां का भी कार्यकाल पांच साल किया जाए, लेकिन किसी भी हुक्मरानों ने इसकी परवाह नहीं की। कश्मीर केंद्रित पार्टियों का राज चलता था। इस वजह से उन्होंने इसे छह साल ही रखा।
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एक हजार से अधिक लोग भेजे गए थे जेल
जम्मू-कश्मीर में आपातकाल के दौरान केवल जम्मू संभाग में ही आंदोलन हुए। सरकार का विरोध करने के आरोप में एक हजार से अधिक लोगों को जेल भेजा गया था। धीरे-धीरे सभी छूटे। तीन महीने से लेकर डेढ़ साल तक लोगों ने विभिन्न जेलों में यातनाएं झेलीं। जनसंघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद समेत संघ के आनुषांगिक संगठनों के कार्यालय सील किए गए।
आपातकाल को लेकर देश ने तो दो साल दंश झेला लेकिन जम्मू-कश्मीर के लोग 45 साल तक इसकी पीड़ा सहते रहे। आपातकाल में लागू छह साल विधानसभा का कार्यकाल केवल जम्मू-कश्मीर में ही रह गया, जबकि देशभर से यह हटा लिया गया था। अब यह काला पन्ना अनुच्छेद 370 हटने के बाद समाप्त हुआ है। आपातकाल के खिलाफ पूरे आंदोलन में कश्मीर ने बहुत अधिक भागीदारी नहीं की।
- प्रो. हरि ओम, जम्मू-कश्मीर राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ