श्रीनगर उपचुनाव में व्यापक हिंसा की षृष्ठभूमि में अनंतनाग के चुनाव भले ही डेढ़ माह के लिए टाल दिया गया हो लेकिन चुनाव आयोग के लिए चुनौतियां घटने के बजाए बढ़ गईं हैं। अलगाववादियों ने चुनाव टलने के निर्णय को अपनी जीत के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया है। उधर पाकिस्तान से घुसपैठ कर आए आंतकी अब खुलेआम वोट बहिष्कार के लिए धमकियां देने लगे हैं।
अलगाववादियों और शरारती तत्वों को उपद्रवियों तक फंडिंग पहुंचाने के लिए और वक्त मिल गया है। लिहाजा 25 मई को भी मतदान की राह आसान नहीं दिख रही। पूरे प्रकरण में चुनाव आयोग के फैसले पर भी सवाल खड़े हुए हैं।
केंद्रीय गृह मंत्रालय और रियासत सरकार की सलाह को नजरअंदाज कर चुनाव की तिथियां घोषित की गईं और श्रीनगर उपचुनाव की हिंसा के बाद जब पूरा विपक्ष मतदान तय समय पर कराने पर जोर दे रहा था, तब अनंतनाग चुनाव की तिथि आगे बढ़ा दी गई। इस बाबत जम्मू कश्मीर के मुख्य चुनाव अधिकारी ने भी तिथि टालने की अनुशंसा नहीं की थी। इस तरह श्रीनगर में तिथि पर विचार के लिए बुलाई गई सर्वदलीय बैठक बेमतलब साबित हो गई।
मस्जिद कमेटियां अभी से वोट बहिष्कार के लिए हुईं सक्रिय
कश्मीर में मतदान के लिए लगी लाइन
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अनंतनाग में श्रीनगर के मुकाबले चुनौतियां ज्यादा गंभीर हैं। इस संसदीय क्षेत्र के 16 विधानसभा क्षेत्रों में से त्राल भी एक है जो आतंकी बुरहान वानी का इलाका है। त्राल में 8 जुलाई को मुठभेड़ में आतंक के पोस्टर ब्वाय बुरहान वानी की मौत के बाद ही कश्मीर में हिसा भड़की थी जिसका असर अभी श्रीनगर उपचुनाव में भी दिखा।
कुलगाम, पुलवामा, शोपियां और अनंतनाग आतंकी घटनाओं के मद्देनजर सबसे ज्यादा संवेदनशील रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार इस इलाके से हाल के दिनों में 119 कश्मीरी युवकों ने आतंकी संगठन ज्वाइन किया है। पांपोर में आधा दर्जन से अधिक आतंकी घटनाएं हुईं हैं। यह इलाका सुरक्षा बलों के लिए भी चुनौती रहा है। आंतकी घटनाओं और उपद्रव की इस पृष्ठभूमि में 25 मई का उपचुनाव चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
आतंकियों ने पुलवामा, कुलगाम, शोपियां और अनंतनाग की मस्जिद कमेटियों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है। मस्जिदों से आजादी के तराने अभी से बजने शुरू हो गए हैं। वोट बहिष्कार की अपीलों के साथ कर्मचारियों और पुलिसकर्मियों को चुनाव ड्यूटी नहीं करने की हिदायतें दी जाने लगी हैं। पाकिस्तानी आतंकी धमकियां देकर जंगलों में गुम हो जाते हैं। ऐसे में निष्पक्ष चुनाव की तैयारियों में भी खलल की आशंका है।