जम्मू-कश्मीर में 50 साल में 5वीं बार इतना लंबा ड्राई स्पेल
मौसम विज्ञान केंद्र श्रीनगर के निदेशक डॉ. मुख्यतार अहमद के अनुसार अल-निनो एक जलवायु संबंधी बदलाव है जो पूर्वी प्रशांत महासागर में स्तरीय जल के असामान्य रूप से गर्म होने के कारण होता है। पानी के तापमान में बदलाव के कारण वातावरण का संतुलन बिगड़ता है और ड्राई स्पेल जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है। जम्मू-कश्मीर में पहले भी लंबे ड्राई स्पेल रहे हैं, लेकिन 50 वर्षों के बीच हुए लंबे ड्राई स्पेल में से इस साल चौथी या 5वीं बार ऐसा फिर देखा गया है। दिसंबर 2003 से जनवरी 2024, दिसंबर, 2018 से जनवरी 2019, दिसंबर, 2016, जनवरी, 2015, दिसंबर, 2014, दिसंबर, 2007, दिसंबर, 2003, दिसंबर 1997, दिसंबर,1987 में मौसम लंबे समय तक शुष्क रहा था।
फरवरी पर उम्मीद, बर्फ से जुड़ी गतिविधियां करवाएंगे : निदेशक जम्मू के पर्यटन निदेशक विवेकानंद राय के अनुसार इस बार दिसंबर से जनवरी तक बर्फ नहीं गिरने से संभाग के पटनीटाप, नत्थाटाप, सनासर, भद्रवाह आदि पर्यटन स्थलों पर लोग कम पहुंचे हैं। अभी फरवरी पर उम्मीद है। बर्फ गिरने पर बर्फ से जुड़ी पर्यटन गतिविधियां करवाएंगे। वहीं, पर्यटन निदेशक कश्मीर, राजा याकूब ने दावा किया कि कश्मीर के पर्यटन पर अधिक असर नहीं देखा गया है। जनवरी में सामान्य तौर पर पर्यटक पहुंचे हैं। हालांकि बर्फ गिरने पर यह आंकड़ा बढ़ेगा।
गेहूं, सरसों आदि फसलों को दिसंबर से आगे विभिन्न चरणों में बारिश की जरूरत है, क्योंकि इस समय नहरें सिंचाई के लिए तैयार नहीं होती हैं। अगर अगले 10 से 15 दिन में पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो सीजनल फसलों पर व्यापक असर देखने को मिलेगा। -राम सेवक, कृषि निदेशक,जम्मू
ड्राई स्पेल से फसलों को नमी नहीं मिल पाई है। जम्मू संभाग के कठुआ, सांबा, जम्मू, उधमपुर, पुंछ और राजोरी बड़े पैमाने पर गेहूं का उत्पादन करते हैं। हालांकि सिंचाई वाले क्षेत्रों में 4-5 वर्षों में गेहूं का उत्पादन बढ़ा है, लेकिन इस बार ड्राई स्पेल होने से इसमें कमी आ सकती है। -केके शर्मा, पूर्व कृषि निदेशक
आने वाले एक या दो दिनों के अंदर पश्चिमी विक्षोभ दोबारा सक्रिय हो रहा है। अनुमान है कि इससे हिमाचल प्रदेश और कश्मीर में बर्फबारी और मैदानी इलाकाें जैसे पंजाब और हरियाणा में कई जगहों पर अच्छी बारिश देखने को मिलेगी। -अजय कुमार सिंह, निदेशक, मौसम विज्ञान केंद्र, चंडीगढ़।
50 फीसदी तक गिर सकती है सेब की पैदावार
हिमाचल, कश्मीर और उत्तराखंड में बर्फबारी नहीं हो रही। सेब और अन्य गुठलीदार फलों को इससे भारी नुकसान हो सकता है। चिलिंग ऑवर पूरे न होने से इस साल सेब का उत्पादन प्रभावित होना तय है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बर्फबारी नहीं हुई तो सेब उत्पादन 50 फीसदी तक गिर सकता है। तापमान 7 डिग्री से नीचे आने पर चिलिंग ऑवर्स शुरू होते हैं। सेब की सामान्य फसल के लिए 1000 से 1600 घंटे चिलिंग ऑवर्स की जरूरत रहती है। -देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ