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Jammu News: केंद्रीय संस्कृत विवि में अब मुख्य विषय के रूप में पढ़ाया जाएगा कश्मीर शैव दर्शन

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- चार वर्षीय स्नातक और एक वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम होगा शुरू
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अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में शैक्षणिक सत्र 2025-26 से चार वर्षीय शास्त्री (यूजी) और एक वर्षीय आचार्य (पीजी) पाठ्यक्रम शुरू होगा। अभी तक यहां कश्मीर शैव दर्शन माइनर विषय के रूप में पढ़ाया जाता था। अब छात्र इसे मुख्य विषय के रूप में चुन सकेंगे। विश्वविद्यालय की नई शिक्षा नीति (एनईपी) पाठ्यक्रम निर्धारण समिति की रिपोर्ट व सुझाव के बाद ये पाठ्यक्रम शुरू हो रहे हैं।
इसमें शास्त्री स्नातक, शास्त्री शोध और आचार्य की उपाधियां सेमेस्टर पूरे करने के आधार पर दी जाएंगी। चार वर्षीय शास्त्री में सभी सेमेस्टरों में मेजर-माइनर (वेद, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्य, दर्शन, बौद्ध दर्शन, कश्मीर शैव दर्शन, जैन दर्शन धर्मशास्त्र, अद्वैत वेदांत, पुराण इतिहास) विषयों के साथ आधुनिक विषय राजनीति विज्ञान, इतिहास, अंग्रेजी, हिंदी, संगणक की पढ़ाई होगी। वहीं, कौशल विकास विषय भी पढ़ने होंगे। नई व्यवस्था के अनुसार शास्त्री में दो सेमेस्टर पूरे करने वाले छात्रों को सर्टिफिकेट, चार सेमेस्टर पूरे करने पर डिप्लोमा, छह सेमेस्टर पर शास्त्री (स्नातक) की डिग्री दी जाएगी। आठ सेमेस्टर की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करने वाले छात्रों को शास्त्री (शोध प्रतिष्ठा) की उपाधि मिलेगी।
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दस सेमेस्टर पूरे करने वालों को सीधे आचार्य या स्नातकोत्तर की डिग्री दी जाएगी। इन छात्रों को शोध के लिए अहम माना जाएगा। सभी सेमेस्टरों में मुख्य विषय 100 अंकों के होंगे। इनमें 60 अंक की लिखित परीक्षा और 40 अंक का सतत मूल्यांकन होगा। छात्रों को माइनर कोर्स के साथ ही इंटर डिसिप्लिनरी विषय और कौशल एवं दक्षता विकास, नैतिक मूल्य विषयों की पढ़ाई भी करनी होगी। दक्षता विकास में भाषाएं और कौशल विकास में योग, कंप्यूटर, संगीत, नाट्य कर्मकांड, ज्योतिष, वास्तु आदि विषय होंगे। पाठ्यक्रम में सभी छात्रों के लिए प्रशिक्षुता अनिवार्य है। इससे छात्रों को रोजगार के लिए उचित माध्यम प्राप्त हो सके।
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हिमालयी क्षेत्रों से शुरू हुआ था शैविज्म
माना जाता है कि कश्मीर शैविज्म चौथी शताब्दी के आसपास हिमालयी क्षेत्र में शुरू हुआ था। सबसे पहले जम्मू और कश्मीर में शैववाद के बारे में लोगों को जानकारी मिली थी। आमतौर पर इतिहासकार इसे लोकप्रिय बनाने में शंकराचार्य का अहम योगदान मानते हैं। यदि कश्मीरी शैविज्म के ऐतिहासिक विकास को देखें तो हिंदू दर्शन के एक महत्वपूर्ण स्कूल के रूप में अद्वैत के विकास में इसका महत्वपूर्ण योगदान है।
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शैविज्म के पहले शिक्षक त्रयंबकादित्य
ऋषि दुर्वासा के शिष्य त्रयंबकादित्य को कश्मीरी शैववाद का पहला शिक्षक माना जाता है। उनके वंशजों ने अगली कई सदियों तक परंपरा को जारी रखा। जम्मू-कश्मीर से ही इसकी परंपरा शुरू हुई थी।
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