जम्मू। शहर में नगर निगम की डॉग रेस्क्यू और नसबंदी मुहिम जमीनी स्तर पर बेअसर है। बख्शी नगर, गुर्जर नगर और गांधी नगर सहित कई प्रमुख इलाकों में आवारा कुत्तों के झुंड राहगीरों और स्थानीय लोगों के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं। लोगों का आरोप है कि बार-बार शिकायतें करने के बावजूद निगम की रेस्क्यू टीम समय पर नहीं पहुंचती। निगम प्रशासन केवल कागजी कार्रवाई और बैठकों तक सीमित है जबकि सड़कों पर आवारा कुत्तों का आतंक लगातार बढ़ रहा है।
गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) जम्मू के एंटी-रेबीज सेक्शन के आंकड़े निगम के दावों की गंभीरता को उजागर कर रहे हैं। मार्च में जहां स्ट्रीट डॉग बाइट के 1432 मामले सामने आए थे, वहीं अप्रैल में 2826 लोग विभिन्न जानवरों के काटने का शिकार हुए। सबसे ज्यादा 1413 मामले आवारा कुत्तों के काटने के दर्ज किए गए। इसके अलावा 738 मामले पालतू कुत्तों, 146 बिल्ली, 72 बंदर और 30 अन्य जानवरों के रहे।
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल में आए मामलों में से 1308 केस श्रेणी-3 के थे, जिन्हें बेहद गंभीर माना जाता है। इनमें गहरे घाव और खून निकलने जैसी स्थिति शामिल होती है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 1229 पीड़ितों को एंटी रेबीज सीरम देना पड़ा जबकि 1391 लोगों को एंटी रेबीज वैक्सीन लगाई गई। स्वास्थ्य विभाग को अप्रैल में 1504 वैक्सीन वायल का इस्तेमाल करना पड़ा। मई में भी अब तक 1200 से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं।
नसबंदी अभियान और शेल्टर होम के दावों की खुली पोल
नगर निगम दावा कर रहा है कि शहर के 70 प्रतिशत आवारा कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है लेकिन लगातार बढ़ते मामले अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। निगम के वर्ष 2023 के सर्वे के अनुसार शहर में करीब 51,600 आवारा कुत्ते हैं। पीरखो की गायत्री देवी, बख्शी नगर के गारु राम व योगेश चंद थापर का आरोप है कि हर मोहल्ले और बाजार में कुत्तों का आतंक बढ़ रहा है लेकिन अधिकारी मौन हैं। आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाने के लिए निगम ने रूपनगर, भगवती नगर और चौआदी में डॉग शेल्टर होम बनाए थे। इसके बावजूद गलियों, पार्कों और बाजारों में झुंड खुलेआम घूम रहे हैं।
अस्पताल में कतारें, दहशत में लोग
जीएमसी में रोजाना 100 से अधिक लोग डॉग बाइट के बाद एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाने पहुंच रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार हर 10 से 15 मिनट में नया मामला सामने आ रहा है। इस समय सबसे ज्यादा खतरा बच्चों और बुजुर्गों पर बना हुआ है जिससे परिवारों में दहशत और चिंता का माहौल है।