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Jammu Kashmir: पाकिस्तानी आतंकी की मदद करने वाले पुलिसकर्मी की बर्खास्तगी बरकरार, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Sun, 31 May 2026 01:49 PM IST
Nikita Gupta अमर उजाला, नेटवर्क श्रीनगर

सार

हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए आतंकी सहायता के आरोपी पुलिसकर्मी की बर्खास्तगी को सही ठहराया। डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच का फैसला पलटते हुए उसे गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण बताया।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : adobestock
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने पाकिस्तानी आतंकी को छिपने में मदद करने के आरोपी पुलिस कांस्टेबल की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है। सिंगल बेंच के आदेश को पलटते हुए डिवीजन बेंच ने उसे अधूरा और गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण करार दिया।

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अदालत ने माना कि राज्य की सुरक्षा के हित में नियमित विभागीय जांच न करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद थी। जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ दायर अपील को मंजूरी दी।फैसले में पुलिस विभाग में चालक के पद पर तैनात कांस्टेबल गुलाम मोहम्मद तांत्रे की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया गया था। तांत्रे की 1991 में पुलिस विभाग में भर्ती हुई थी। दो अप्रैल, 2007 को एक आदेश के जरिये सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।

यह कार्रवाई जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल ने पूर्व संविधान की धारा 126(2)(सी) का इस्तेमाल करते हुए की थी जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 311(2)(सी) के अनुरूप है। यह प्रावधान किसी सरकारी कर्मचारी को बगैर विभागीय जांच बर्खास्त करने की इजाजत देता है।बेंच ने टिप्पणी की कि हालांकि किसी सिविल सेवक को आमतौर पर बिना आरोप, जांच और सुनवाई के उचित अवसर के बर्खास्त या हटाया नहीं जा सकता लेकिन संविधान राज्य की सुरक्षा से जुड़े मामलों में यह एक अपवाद है।
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इस आधार पर दी थी सेवा बर्खास्तगी को चुनौतीतांत्रे ने हाईकोर्ट में बगैर किसी विभागीय जांच और बचाव का अवसर दिए बिना सेवा से बर्खास्त न किए जा सकने को आधार बनाते हुए आदेश को चुनौती दी थी। कोर्ट ने उस समय जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा स्थिति का संज्ञान लेते हुए कहा कि एक पड़ोसी देश के इशारे पर काम करने वाले तत्वों ने सरकारी कर्मचारियों को अपने साथ मिलाकर आतंक फैलाने और सरकारी तंत्र में घुसपैठ करने की कोशिश की थी। सरकार ने दलील दी कि शुरुआत में तांत्रे के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई थी लेकिन बाद में पाया कि संवेदनशील सुरक्षा जानकारी और गवाहों की पहचान उजागर हो सकती है। गवाह बदले की कार्रवाई के डर से सामने नहीं आ सकते थे। जांच अधिकारी को भी ऐसे संगठनों से जान, परिवार और संपत्ति का खतरा हो सकता था।

यह था मामला...तांत्रे पर वर्ष 2004 में राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप था। तांत्रे को श्रीनगर के जडीबल पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। कोर्ट ने पाया कि उस समय के सरकारी रिकॉर्ड जैसे-पूछताछ की रिपोर्ट और कैबिनेट के विचार के लिए गृह विभाग की ओर से तैयार किया मेमोरेंडम शामिल था, से पता चलता है कि तांत्रे एक पाकिस्तानी सैनिक के संपर्क में था। उसने हाजी मुश्ताक गाजी के घर में उसके लिए एक स्थायी ठिकाना बनाया था। फैसले में दर्ज है कि छापा मारे जाने पर उस घर से भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद बरामद किया गया। हाजी मुश्ताक की भूमिका की जांच के दौरान तांत्रे का नाम सामने आया। उसके किराए के मकान की तलाशी में दो हैंड ग्रेनेड बरामद हुए थे। जेएनएफ

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