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आज डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देगी व्रती महिलाएं

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जम्मू में छन्नी के पास बाजार में छठ व्रत के लिए पूजन सामग्री की खरीदारी करते श्रद्धालु। - संजय गु
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जम्मू। लोक आस्था के पर्व छठ में शुक्रवार को रसियाव-रोटी के साथ व्रतियों ने खरना पूजा की। रात को व्रतियों ने खीर और रोटी का प्रसाद चढ़ा कर खुद भी सेवन किया। शनिवार को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा, जबकि रविवार सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत संपन्न हो जाएगा। इसके बाद व्रती अन्न ग्रहण और पारण करेंगी। वीरवार को चार दिवसीय अनुष्ठान नहाय-खाय के साथ छठ पर्व की शुरुआत हुई।
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छठ पर्व को लेकर शहर के बागड मार्केट त्रिकुटानगर, नई बस्ती, डिग्याना सहित अन्य स्थानों पर व्रतियों ने जमकर खरीदारी की। महिलाओं ने व्रत के सामान की खरीदारी की। शहर के छन्नी के पास सजे बाजार में काफी संख्या में लोग खरीदारी के लिए पहुंचे। इस दौरान व्रत रखने वाली शांति देवी ने बताया कि शनिवार को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दौरान व्रतियों ने फल-फूल की खरीदारी की। छठ पर्व को लेकर उन इलाकों में काफी रौनक रही जहां बिहार, उत्तर प्रदेश से आए लोग रहते हैं। शुक्रवार को तवी नदी के साथ बाड़ी ब्राह्मणा, डिग्याना, कालूचक सहित अन्य इलाकों से गुजरने वाली नहर के घाट की साफ की गई। घाट पर श्रद्धालुओं के बैठने के लिए स्थान को सजाया गया। शनिवार को सभी व्रती सूर्य देवता की उपासना करेंगे। शुक्रवार को रसियाव-रोटी के साथ व्रतियों ने खरना पूजा कर सुख - समृद्धि की कामना की। सूर्य को अर्घ्य देने के दौरान महिलाएं हाथों में फल-फूल और अन्य पकवान और सूप में रखकर जलाशयों में सूर्य की उपासना करेंगी।
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कई नामों से जाना है छठ पर्व
जम्मू। महंत रोहित शास्त्री ने बताया कि इस पर्व को कई नामों से जाना जाता है। जैसे छठ पूजा, छठी माई की पूजा, छठ पर्व और सूर्य षष्ठी व्रत आदि। छठ पूजा के दिन माता छठी की पूजा की जाती है। जिन्हें सूर्य देव की पत्नी ऊषा कहा गया है। इस दिन सूर्य देवता की पूजा का महत्व पुराणों में निकलता है। इस वर्ष सूर्य षष्ठी दो नवंबर को है। यह व्रत बड़े नियम व निष्ठा से किया जाता है। इसमें तीन दिन के कठोर उपवास का विधान है। इस व्रत को करने वाली स्त्रियों को पंचमी को एक बार नमक रहित भोजन करना पड़ता है। षष्ठी को निर्जल रहकर व्रत करना पड़ता है। षष्ठी को अस्त होते हुए सूरज को विधिपूर्वक पूजा करके अर्घ्य देते हैं। सप्तमी के दिन प्राताकाल नदी या तालाब पर जाकर स्नान करना होता है। सूर्य उदय होते ही अर्घ्य देकर जल ग्रहण करके व्रत खोलना होता है। इस व्रत पर प्रसाद मांग कर खाने का विधान है। लोहंडा और खरना यह दूसरा दिन होता है जो कार्तिक शुक्ल की पंचमी कहलाती है। इस दिन दिन भर निराहार रहते हैं, रात्रि में खीरनी खाई जाती है और प्रसाद के रूप में सभी को दी जाती है।
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